मुहब्बत बनाम कैमिकल लोचा...


एक मशहूर लेखक ने हमसे कहा- जानती हो मुहब्बत क्या है...?
हमने कहा- आप ही बताएं...
कहने लगे कि जब इंसान किसी को पसंद करता है, तो वह उसे पाना चाहता है... इस दौरान उसके दिमाग़ जो कैमिकल लोचा होता है, उसकी वजह से उसे बेचैनी होती है, दरअसल वही मुहब्बत है... जब वह उसे पा लेता है, तो उसकी बेचैनी ख़त्म हो जाती है और उसके साथ मुहब्बत भी...

फिर काफ़ी अरसे बाद उन्होंने कहा कि उन्होंने एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने मुहब्बत के बारे में बहुत दिल से लिखा है... पढ़ना ज़रूर...  हम सोचने लगे कि उन्होंने ’मुहब्बत’ के बारे में लिखा है या ’कैमिकल लोचा’ के बारे में... :)
लेखक से माज़रत चाहते हैं...

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लड़की...


फ़िरदौस ख़ान
लड़की छत पर टहल रही थी. मौसम ख़ुशगवार था. आसमान में काली घटायें छाई हुई थीं. ठंडी हवा चल रही थी. लगता था, कहीं दूर बारिश हो रही है. लड़की बेचैन थी. वह क्यों बेचैन थी, इसका जवाब वह ख़ुद भी नहीं जानती थी. बस वो भीगना चाहती थी. वह चाहती थी कि सारी घटा यहीं बरस जाए और उसका रोम-रोम बारिश में भीग जाए. बूंदों की ठंडक उसके जिस्म में समा जाए, उसकी रूह में उतर जाए. लेकिन किसी के चाहने से घटायें कहां बरसने वाली थीं. उन्हें जब और जहां बरसना होता है, वहीं बरसा करती हैं.
वहीं कुछ दूर छत पर एक लड़का पतंग उड़ा रहा था. उसकी नज़र लड़की पर पड़ती है. न जाने क्या सोचकर लड़का पतंग की डोर एक बच्चे को पकड़ा देता है और ख़ुद लड़की को निहारने लगता है. शायद उसे लंबे बालों वाली लड़की अच्छी लगी थी. लड़की का सब्ज़ लिबास और हवा में लहराता उसका दुपट्टा उसे अपनी तरफ़ खींच रहा था. अचानक लड़की की नज़र उस लड़के पर पड़ती है. पहली ही नज़र में उसे लड़का अच्छा लगता है. उसने महसूस किया कि उसकी बेचैनी ख़त्म हो चुकी है. तभी बारिश होने लगती है और लड़की पानी की बूंदों को अपनी हथेलियों के कटोरे में भर लेना चाहती है. लड़का अब भी उसे निहार रहा है. लड़की को महसूस होता है कि अचानक सावन आग बरसाने लगा है, जिसमें वह झुलसती जा रही है. लड़की छत से नीचे उतर आती है. मौसम अब भी ख़ुशगवार है. बादल बरस रहे हैं और वो भीगना चाहती है, लेकिन छत पर नहीं जाना चाहती. उसे लगता है कि लड़के की नज़रों से ये सावन सुलगने लगा है. 
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मार्मिक कथाओं का बेहतरीन संग्रह


फ़िरदौस ख़ान
बीसवीं सदी के यशस्वी कथाकार कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के शीर्षस्थ स्तंभ थे, जिनकी लेखनी का बड़े-बड़े कथा मर्मज्ञों ने लोहा माना है. उन्होंने दो सौ से ज़्यादा कहानियां लिखीं. हिन्द पॉकेट बुक्स ने उनकी कहानियों को पेपरबैक्स में प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक उनकी कहानियां पहुंच सकें. हाल में प्रकाशित कहानी संग्रह एक अश्लील कहानी में कमलेश्वर की कई चर्चित कहानियों को शामिल किया गया है.

इंसान ज़िंदगी में बहुत कुछ चाहता है, जैसे दौलत, इज़्ज़त और शौहरत, लेकिन इन सबके बीच वह सुकून को भूल जाता है. जब वह दुनिया का हर सुख भोग लेता है, तब उसे सुकून की तलाश होती है. और इसी सुकून को पाने के लिए वह न जाने कहां-कहां भटकता है. मगर सुकून बाहर कहीं भी नहीं मिलता, क्योंकि इसे इंसान को अपने भीतर ही खोजना प़डता है. दरअसल, सुकून इंसान को उसके नेक कर्मों की बदौलत ही मिलता है. नीली झील भी एक ऐसी ही कहानी है, जो इंसान को नेक काम करने की नसीहत देती है. हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित कमलेश्वर के कहानी संग्रह एक अश्लील कहानी में संग्रहीत नीली झील में कहानी का एक पात्र महेस पांडे मंदिर बनवाने की बजाय परिंदों को शिकारियों के निशाने से बचाने के लिए नीली झील ख़रीद लेता है. पारबती की ख़्वाहिश थी कि उसका पति महेस पांडे चबूतरे के पास वाला कू़डा़ख़ना ख़रीद ले, क्योंकि वह चबूतरे पर एक मंदिर और उसके पास ही मुसाफ़िरों के लिए एक धर्मशाला बनवाना चाहती थी. मरते वक़्त भी उसने अपने पति से यही वचन लिया था. पारबती की मौत के बाद महेस पांडे ने कुल जमा पूंजी इकट्ठी की और जब पैसे कम पड़ गए, तो उसने गांववालों से मंदिर और धर्मशाला के लिए चंदा एकत्र किया. लेकिन उसके साथ एक वाक़या ऐसा पेश आया कि उसका इरादा बदल गया और उसने मंदिर के लिए जमा पैसा कहीं और लगा दिया. कहानी का यह अंश देखिए, सुबह उठा, तो मन नहीं लगा और वह शांति पाने के लिए झील की ओर चला. झील पर पहुंच कर अपनी लाठी से वह काई को छितराता रहा. सिवार के सूतों को उलझाकर उसने निकाला, नन्हे-नन्हे बीज चुनकर मुंह में डाल लिए और उठकर उधर चला गया, जिस ओर जलमंजरी खिली हुई थी. जलमंजरी के पास से ही दलदल शुरू हो जाता था. नारी की बेल पानी में तारों की तरह बिछी हुई थी और गांठों के पास नन्हे-नन्हे घोंघे चिपके हुए थे. सूत-सी सफ़ेद नन्ही-नन्ही जड़े मछली के उजले पंखों की तरह धीरे-धीरे कांप रही थीं. दलदल में घुसकर उसने जलमंजरी के फूल तोड़े और गुच्छा बनाकर लौटने लगा. सोनापतारी का एक झुंड रात भर चारा खाकर उड़ने ही वाला था कि एक गोली उस पार से छूटी और उड़ते सोनापतारी के झुंड में से एक पक्षी बिलबिलाकर छप्प से झील के बीचों-बीच गिर पड़ा. उसके सोने से पर छितरा गए और नीली झील के ख़ामोश पानी पर एक हलचल हुई. एक क्षण बाद ही लाल ख़ून की एक पतली-सी लकीर पानी पर खिंची और सोनापतारी तैरती हुई उस पार जाने की कोशिश करने लगी. उसके नरम पर फड़फड़ा रहे थे और पानी पर ख़ून की लकीर उसका पीछा कर रही थी. झुरमुट में से शिकारी निकले. उन्होंने देखा, पर वह पक्षी तैरता हुआ उस किनारे निकलकर किसी झाड़ी में दुबक कर ख़ामोश हो गया. शिकारियों ने बहुत खोजा, पर पक्षी नहीं मिला. झील पर मिटती हुई लकीर के बीच एकाध पंख पड़ा था. उसका मन उचाट हो गया. जलमंजरी के फूलों को वहीं फेंककर वह लौट आया. पारबती की याद उसे फिर आई और नीलाम वाले दिन उसने तीन हज़ार की बोली लगाकर चबूतरे के पास वाली ज़मीन नहीं, दलदली नीली झील ख़रीद ली. लोगों की आंखें फट गईं. इसका दिमाग़ ख़राब नहीं हो गया? मंदिर का नाम लेकर इसने धोखा दिया है. रुपया हज़म कर गया है? लेकिन उसने किसी को कोई जवाब नहीं दिया और मन में लगता कि अब तो वह पारबती को भी जवाब नहीं दे सकता. उसके पास जवाब है ही क्या? फागुन आते-आते मेहमान पक्षी उड़ गए. पवनहंस चले गए. सफ़ेद सुरख़ाब अपने घरों में लौट गए.  मुअर, संद, करकर्रा और सरपपच्छी भी चले गए. झील बहुत सूनी हो गई थी, पर महेस पांडे को विश्वास था कि ये फिर हमेशा की तरह अपने झुंडों के साथ कार्तिक-अगहन तक वापस आएंगे. महेस पांडे लिखना-पढ़ना तो जानता नहीं था, बस, झील वाले रास्ते के पहले पेड़ पर उसने एक तख्ती टांग दी थी, जिस पर उसने लिखा था, यहां शिकार करना मना है. और नीचे की पंक्ति थी, दस्तख़त नीली झील का मालिक-महेस पांडे.

कमलेश्वर ने अपने शब्द चित्रण के ज़रिये नीली झील का बेहद मनोहारी वर्णन किया है. कहानी पढ़ते वक़्त ऐसा लगता है कि हम साक्षात सारी घटनाओं को अपने सामने घटित होते हुए देख रहे हैं. वह जनमानस की व्यथा-कथा को मार्मिक शब्दों के माध्यम से अपनी कहानी में इस तरह उतार देते थे कि पढ़ने वाला भावुक हो जाता है. उनके पात्र जीवंत नज़र आते हैं. इस किताब में शामिल अन्य कहानियां नागमणि, गर्मियों के दिन, और कितने पाकिस्तान, एक अश्लील कहानी, जामातलाशी, मुर्दों की दुनिया, आज़ादी मुबारक, रात, औरत और गुनाह, भरे-पूरे-अधूरे, मरियम, रावल की रेल, एक रुकी हुई ज़िंदगी भी मन को छू लेती हैं. दरअसल, बीसवीं सदी के यशस्वी कथाकार कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के शीर्षस्थ स्तंभ थे, जिनकी लेखनी का बड़े-बड़े कथा मर्मज्ञों ने लोहा माना है. बक़ौल कमलेश्वर, नई कहानी के दौर का सुख और विलक्षण अनुभव था, जब कहानियों के साथ और कहानियों की बदौलत चेतना को रेखांकित करने के लिए पाठकों की एक बहुत बड़ी जमात कथा-रचना के जीवंत और मनुष्य-परक उत्सव में शामिल हुई थी. कहानी अपने समय के मनुष्य पर ज़्यादा खरी उतरी थी. अपने समय के यथार्थ और सामान्य-जन के आत्मिक और भौतिक संतापों का सामना किया था.

कमलेश्वर ने दो सौ से ज़्यादा कहानियां लिखीं. हिन्द पॉकेट बुक्स ने कमलेश्वर की कहानियों को पेपरबैक्स में प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक ये कहानियां पहुंच सकें. यह किताब इसी सिलसिले का एक हिस्सा है, जो पाठकों को ख़ासी पसंद आएगी.
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शदीद मुहब्बत...


शदीद मुहब्बत... 
जैसे 
जून में 
सूरज ज़मीन पर उतर आए 
जैसे 
सावन में आग बरसे...
-फ़िरदौस ख़ान
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सही पता न होने से ज़िन्दगी अज़ाब बनी...


-फ़िरदौस ख़ान
सही पता न होने की वजह से ज़िन्दगी में कितनी बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं...  इसका ख़ामियाज़ा भुगत रहे लोगों को भी शायद इसका अंदाज़ा नहीं होगा... ग़ौर करने पर यही बातें सामने आती हैं कि सही पता न होने की वजह से डाक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाती... लोगों को घर ढूंढने में दिक़्क़त होती है... वग़ैरह-वग़ैरह... लेकिन मसला यहीं आकर ख़त्म नहीं हो जाता...
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सही पता न होने की वजह से बहुत से लोगों की ज़िन्दगी अज़ाब बन गई है... अफ़सोस की बात यह है कि वे ख़ुद इस बारे में नहीं जानते होंगे...

हुआ यूं कि कई बरस पहले गुमशुदा बच्चों से वाबस्ता एक स्टोरी के लिए हमने दिल्ली के कई पुलिस थानों का दौरा किया... ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने बच्चों को बरामद कर लिया था, लेकिन इसके बावजूद बच्चे अपने घर नहीं पहुंच सके... वजह, बच्चों के वालदेन ने जो पते लिखवाए थे, वे सही नहीं थे... पुलिस उन पतों पर गई, लेकिन वहां वे लोग नहीं मिले, जिनके नाम पुलिस के रजिस्टर में दर्ज थे... आख़िरकार पुलिस ने बच्चों को अनाथ आश्रम वग़ैरह में भेज दिया... पुलिस का कहना था कि शुरू में तो लोग अपने बच्चों की खोज-ख़बर के लिए आते हैं, लेकिन कुछ वक़्त बाद आना छोड़ देते हैं...

हमें इस बात पर हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है कि लोग अपने ही लिखवाए पते पर न मिलें... इसलिए हमने बच्चों के वालदेन को तलाशने का फ़ैसला किया... हमने पुलिस के रजिस्टर से उन बच्चों के घरों के पते लिए, जो पुलिस ने बरामद किए थे... हमने दो दिन दिल्ली के न जाने कितने इलाक़ों की ख़ाक छानी... लेकिन जब काग़ज़ पर लिखे पते पर पहुंचते, तो पता चलता कि इस इलाक़े में, इस नंबर की गली है ही नहीं... या इस गली में इस नंबर का मकान ही नहीं है... अगर कोई मकान मिल गया, तो पता चला कि उस मकान में उस नाम का शख़्स कभी रहा ही नहीं... वग़ैरह-वग़ैरह...

न जाने कितने बच्चे सही पता न होने की वजह से अनाथों की तरह पल रहे हैं... और उनके मां-बाप अपने बच्चों की याद में तड़प रहे होंगे...
बेहद तकलीफ़देह हालत है...

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दहकते लम्हों का मौसम...


मेरे महबूब !
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
जिसकी सुबह
दहकती हैं
दहकते पलाश के
सुर्ख़ फूलों की तरह...
जिसकी दोपहरें
दहकती हैं
तपते सहरा की
गरम रेत की तरह...
जिसकी फ़िज़ाओं में
आंधियां चलती हैं
और
हर सिम्त
धूल के ग़ुबार उड़ते हैं
वीरान सड़कों पर
ख़ामोशी-सी बिछ जाती है...
मेरे महबूब
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
जिसकी शामें
सुलगती हैं
चंदन की अगरबत्तियों की तरह
और
फ़िज़ा में भीनी महक छोड़ जाती हैं...
जिसकी रातें
पिघलती हैं
फ़ानूस में लगी
सफ़ेद मोमबत्तियों की तरह
और
इसी तरह
दहकते, सुलगते
उम्र का एक और दिन
ग़र्क़ हो जाता है
वक़्त के अलाव में...
सच
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
-फ़िरदौस ख़ान

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शुक्रिया एबीपी न्यूज़...


Firdaus Diary... दरअसल हमारी डायरी है... इसमें हमारे गीत हैं,  ग़ज़लें हैं, नज़्में हैं, उन किताबों का ज़िक्र है, जो हमने पढ़ी हैं... इसमें मुख़्तलिफ़ मौज़ूं पर भी तब्सिरे हैं...  और इस सबसे बढ़कर इसमें हमारी ज़िन्दगी की किताब के कई वर्क़ दर्ज हैं... हमें डायरी लिखने की आदत है... स्कूल के वक़्त से ही डायरी लिख रहे हैं... कुछ साल पहले अंतर्जाल पर भी बलॊग लिखना शुरू किया... शुरुआत हिंदी से की थी... बाद में उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी बलॊग लिखने लगे... डायरी लिखना ही नहीं, पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है... अकसर अपनी पुरानी डायरियां पढ़ने बैठ जाते हैं... दरअसल, डायरी ज़िंदगी की एक किताब ही हुआ करती है, जिसके औराक़ (पन्नों) पर हमारी यादें दर्ज होती हैं... वो यादें, जो हमारे माज़ी का अहम हिस्सा हैं...

हिन्दी दिवस के मौक़े पर ख़बरिया चैनल एबीपी न्यूज़ ने दिल्ली के पार्क होटल में आयोजित एक भव्य समारोह में हमें साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॊगर पुरस्कार से सम्मानित किया. हमारा चयन  एबीपी न्यूज़ के ख़ास मेहमान सुधीश पचौरी, डॉ. कुमार विश्वास, प्रसून जोशी और नीलेश मिश्र ने किया. इस सम्मान के लिए हम एबीपी न्यूज़ और सुधीश पचौरी जी, डॉ. कुमार विश्वास जी, प्रसून जोशी जी और नीलेश मिश्र जी के तहेदिल से शुक्रगुज़ार हैं...
यह पुरस्कार हम अपने उन सभी शुभचिंतकों और पाठकों को समर्पित करते हैं, जो हमारी तहरीर पढ़ते और पसंद करते हैं...

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ज़ाफ़रान के फूल…


फ़िरदौस ख़ान
जब भी घर का ज़िक्र आता है तो आंखों के सामने क्यारियों में खिले ज़ाफ़रान के फूल महकने लगते हैं. बरसों पहले अब्बू ज़ाफ़रान के पौधे लाए थे. अब अब्बू इस दुनिया में नहीं हैं, बस उनकी यादगार के तौर पर ज़ाफ़रान के पौधे हैं, उनके फूल हैं, और अब्बू की नसीहतों से महकती उनकी यादें हैं. हमारे यहां बरसों से ग़ुलाम मुहम्मद रहे हैं. हर साल सर्दियों में हम उन्हीं से गर्म कपड़े और शालें ख़रीदते हैं. उन्हें भी ज़ाफ़रान के पौधे बहुत अज़ीज़ हैं, कहते हैं कि इन्हें देखकर अपने वतन की याद जाती है. 

ज़मीं की जन्नत माने जाने वाले कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में महकते ज़ाफ़रान के फूल फ़ारसी से इस शेअर की याद दिला देते हैं-   
गर फ़िरदौस बररू-- ज़मीं अस्त हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्त
यानी अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है...

सदियों से कश्मीर में ज़ाफ़रान की खेती हो रही है. कहा जाता है कि क़रीब आठ सौ साल पहले ख्वाजा मसूद और हज़रत शे़ख शरी़फ़ुद्दीन मध्य-पूर्वी एशिया से ज़ाफ़रान का पौधा अपने साथ लाए थे. यहां आकर वे बीमार हो गए और तब एक हकीम ने उनका इलाज किया. इस पर ख़ुश होकर उन्होंने ज़ाफ़रान का पौधा हकीम को दे दिया. इसलिए ज़ाफ़रान की पैदावार के वक़्त पंपोर की इन सूफ़ियों के मक़बरे वाली मस्जिद में नमाज़ भी अदा की जाती है. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यहां ज़ाफ़रान की खेती का सिलसिला दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है.  

ज़ाफ़रान को केसर भी कहा जाता है. इसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है. हालांकि दुनिया के कई देशों में इसकी खेती होती है. इनमें भारत, चीन, तुर्किस्तान, ईरान, ग्रीस, स्पेन, इटली फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस, आस्ट्रिया और  स्विटज़रलैंड शामिल हैं. स्पेन दुनिया का सबसे बड़ा ज़ाफ़रान उत्पादक देश है, जबकि  ईरान दूसरे दर्जे पर है. इन दोनों देशों में सालाना क़रीब तीन सौ टन ज़ाफ़रान का उपादान होता है, जो  कुल उत्पादन का 80 फ़ीसदी है. भारत में इसकी खेती जम्मू-कश्मीर में होती है. जम्मू कश्मीर के कृषि मंत्री ग़ुलाम हसन के मुताबिक़ 2009-2010 के दौरान प्रदेश में 83 क्विंटल ज़ाफ़रान का उत्पादन हुआ. इसमें से 80 क्विंटल का उत्पादन जम्मू डिवीजन के पम्पोर में और 3.60 क्विंटल का उत्पादन कश्मीर के किस्तवार ज़िले में हुआ. ज़ाफ़रान की खेती का रक़बा भी साल 2000 के 2931 हेक्टेर के मुक़ाबले 2010-11 में ब़ढकर 3785 हो गया है. 

साल के अगस्त-सितंबर माह में इसके कंद रोपे जाते हैं. अक्टूबर-दिसंबर तक इसमें पत्तियां जाती हैं और फूल खिलने लगते हैं, जो अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को ख़ुशनुमा बना देते हैं. ज़ाफ़रान की खेती के लिए समुद्रतल से क़रीब  दो हज़ार मीटर ऊंचे पहाड़ी इलाक़े और शीतोष्ण सूखी जलवायु की ज़रूरत होती है. पौधे के लिए दोमट मिट्टी अच्छी रहती है. ज़ाफ़रान का पौधा बहुवर्षीय होता है और यह 15 से 25 सेमी ऊंचा होता है. पत्तियां घास तरह लंबी, पतली और नोकदार होती हैं. इसमें बैगनी रंग की फूल खिलते हैं. फूल में ज़ाफ़रान के तंतु होते हैं. इसके बीज आयताकार, तीन कोणों वाले होते हैं. ज़ाफ़रान के फूलों को चुनकर छायादार जगह पर बिछा दिया जाता हैसूख जाने पर फूलों से ज़ाफ़रान को अलग कर लिया जाता है. ज़ाफ़रान के रंग और आकार के हिसाब से उन्हें मागरा, लच्छी, गुच्छी आदि हिस्सों में बांट दिया जाता है. क़रीब डेढ़ लाख फूलों से एक किलो ज़ाफ़रान मिलता है, जिसकी क़ीमत डेढ़ लाख रुपये से ज़्यादा है.

ग़ुलाम मुहम्मद बताते हैं कि ज़ाफ़रान के पौधे का हर हिस्सा इस्तेमाल में लाया जाता है. ज़ाफ़रान की पंखड़ियों की सब्ज़ी बनाई जाती है. इसके डंठल जानवरों को खाने के लिए दे दिए जाते हैं. वह कहते हैं कि ज़ाफ़रान के फूल खिलने के दौरान यहां के बाशिंदों की ज़िन्दगी में काफी बदलाव जाता है. फ़िज़ां में बिखरी ज़ाफ़रान की ख़ुशबू, और हर जगह ज़ाफ़रान की ही बातें. इस दौरान तो भिखारी भी ज़ाफ़रान के फूलों का ही सवाल करते हैं. बाग़बां भी ज़ायक़ेदर फलों के बदले ज़ाफ़रान के महकते फूल ही लेना पसंद करते हैं.

ज़ाफ़रान एक औषधीय पौधा है और दवाओं में इसका इस्तेमाल होता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ ज़ाफ़रान में तेल 1.37 फ़ीसदी आर्द्रता 12 फ़ीसदी, पिक्रोसीन नामक तिक्त द्रव्य, शर्करा, मोम, प्रोटीन, भस्म और तीन रंग द्रव्य पाएं जाते हैं. अनेक खाद्य पदार्थों ख़ासकर मिठाइयों में ज़ाफ़रान का इस्तेमाल किया जाता है.
इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ एल अकीला और ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में कहा गया है कि बुढ़ापे में ज़ाफ़रान की मदद से अंधेपन को रोका जा सकता है. हर रोज़ ज़ाफ़रान खाने से बीमारियों के ख़िलाफ़ आंखों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. शोध दल के प्रमुख प्रोफेसर सिलविया बिस्ती का कहना है कि केसर में कई गुण होते हैं जो रोशनी के लिए रक्षक का काम करते हैं.

बाज़ार में नक़ली ज़ाफ़रान की भी भरमार है. इसलिए असली ज़ाफ़रान की पहचान ज़रूरी है. असली ज़ाफ़रान पानी में पूरी तरह घुल जाता है. ज़ाफ़रान को पानी में भिगोकर कपड़े पर रगड़ने से अगर ज़ाफ़रानी रंग निकले तो उसे असली ज़ाफ़रान समझना चाहिए और और पहले लाल रंग निकले और बाद में पीला पड़ जाए तो वह नक़ली ज़ाफ़रान होगा.

बहरहाल, राजधानी दिल्ली में हम ज़ाफ़रान के पौधे तलाश रहे हैं. शायद कहीं मिल जाएं...   
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इतवार...


आज इतवार है... हमेशा की तरह आज भी तुम चर्च गए होंगे... फ़र्क़ बस इतना है कि आज हम तुम्हारे साथ नहीं हैं... आज ही क्या... न जाने कितने अरसे से हम एक साथ चर्च नहीं गए...
तुम्हें मालूम है... हर इतवार को वही बीता हुआ इतवार सामने आकर खड़ा हो जाता है... वही सर्दियों वाला इतवार... जब फ़िज़ा में ठंडक घुल चुकी थी... सुबहें और शामें कोहरे से ढकी हुई थीं... गुनगुनी धूप भी कितनी सुहानी लगती थी... ज़र्द पत्ते अपनी शाख़ों से जुदा होकर गिर रहे थे... चर्च के सामने वाली सड़क पर सूखे पत्तों का ढेर लग जाता था... चर्च की क्यारियों में कितने रंग-बिरंगे फूल अपनी शाख़ों पर इठलाते थे... माहौल में गुलाब की भीनी-भीनी महक होती थी...
तुम्हें याद है, जब ठंडी हवाएं चल रही थीं, तब तुमने अपना गर्म कोट उतार कर हमें पहना दिया था... बिना यह परवाह किए कि तुम्हें भी उस कोट की उतनी ही ज़रूरत थी... हमारे कोट लेने से मना करने पर तुमने मुस्कराते हुए कहा था- मर्दों को उतनी ठंड नहीं लगती... सच, उस कोट में हमने जो गर्मी महसूस की, उसमें तुम्हारी मुहब्बत की शिद्दत भी शामिल थी... कितने बरस बीत गए... जाड़ो के कई मौसम गुज़र गए... लेकिन उस कोट की गरमाहट हमारी रूह में अब तक बसी हुई है...
आज भी चर्च देखते हैं, तो तुम बहुत याद आते हो... और यह इतवार... भी उसी इतवार में जा बसा है, या यूं कहें कि वो इतवार अब हर इतवार में शामिल रहता है...
सुनो, हमें फिर से तुम्हारे साथ उसी इतवार को जीना है...

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ख़ुशी...


ख़ुश रहना भी एक कला है... और बच्चे इस कला में माहिर हुआ करते हैं... वे जानते हैं कि कैसे ख़ुश रहा जाता है...  कल ख़ुशी नाम की एक बच्ची ने हमसे कहा कि दीदी परसो यही सूट पहनना... हमने पूछा, परसो क्या है...? उसने कहा कि परसो मेरा बर्थ डे है... हमने कहा कि पिछले हफ़्ते ही तो तुम्हारा बर्थ डे था... कहने लगी, तो क्या हुआ... परसो भी मेरा बर्थ डे है... हमने कहा, ठीक है... लेकिन यह सूट क्यों पहनें... कहने लगी, मुझे यह कपड़े बहुत अच्छे लगते हैं... सुर्ख़ और हरे रंग का महीन काम वाला यह सूट हमारे एक रिश्तेदार कराची से लाए थे... पिछली ईद पर हमने इसे पहना था... पहली क्लास में पढ़ने वाली ख़ुशी को यह सूट बहुत पसंद है... शायद इसका चटक़ रंग और सुनहरा काम... उसे भाता है... ख़ैर, ख़ुशी की ख़ुशी के लिए कल हम यही सूट पहनकर उसके पास जाएंगे... आख़िर कल उसका बर्थ डे है... यानी वीकली बर्थ डे... :)

तस्वीर : गूगल से साभार

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पवित्र बाइबल...


गुज़श्ता दिनों हमने अपनी पढ़ी हुई अंग्रेज़ी की दस किताबों की पहली फ़ेहरिस्त लिखी थी... आज दूसरी फ़ेहरिस्त की बारी है... आज हम सिर्फ़ एक ही किताब का ज़िक्र करेंगे... वह किताब हमारे दिल के बेहद क़रीब है... और उस पाक किताब का नाम है The Bible यानी पवित्र बाइबल... यह ऐसी किताब है, जो सीधा दिल पर असर करती है... इसके लफ़्ज़ रूह की गहराई में उतर जाते हैं...
बाइबल हमें बताती है-
जब हम परमेश्वर के प्रेम को दूसरों के साथ बांटते हैं, तब हम उसके प्रति अपना प्रेम दिखाते हैं...

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गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूलों वाली चादर...


फ़िरदौस ख़ान
छोटी-छोटी चीज़ें ज़िन्दगी में बहुत अहम हुआ करती हैं... हमें किसी चीज़ से प्यार सिर्फ़ इसलिए नहीं होता कि वह चीज़ अच्छी है, बल्कि इसलिए होता है, क्योंकि उससे हमारे जज़्बात वाबस्ता होते हैं... जैसे हमारी चादर... सुर्ख़ गुलाब और बेला-चमेली के फूलों वाली चादर... हमें ऐसी चादरें बहुत अच्छी लगती हैं, जिन पर गुलाब के फूल बने हों... जिन पर बेला-चमेली के सफ़ेद फूल बने हों... जवाज़ यह है कि उन्हें गुलाब के सुर्ख़ फूल अच्छे लगते हैं और हमें बेला-चमेली के सफ़ेद फूल पसंद हैं... हमारे पास एक चादर है, बादामी बॊर्डर वाली, जिसकी कत्थई ज़मीन पर गुलाब के फूल बने हैं... और गुलाब के फूलों के साथ ही उस पर चमेली के सफ़ेद फूल भी हैं... उसे बिछाने पर ऐसा लगता है, जैसे गुलाब और चमेली की सेज सजी हो...
ख़ास मौक़ों पर हम उसे बिछाते हैं... हमें ऐसी ही और चादरों की तलाश है, जिन पर गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूल हों... बस, एक दिन भाभी के साथ बाज़ार जाएंगे और एक साथ कई चादरें ख़रीद लेंगे... गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूलों वाली...
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