आख़िरी मुलाक़ात

सईद साहब आज फिर हमने आपके कहने पर एक कहानी पोस्ट की. इस कहानी के पोस्ट करने बाद हमें कई मेल मिले, जिनमें कहा गया है कि हमने तो उन्हें रुला ही दिया. आपने भी आज कमेन्ट न कर मेल ही किया है. अब हम क्या कहें...जिन्दगी की किताब में बहुत से ऐसे वर्क़ होते हैं, जो आंसुओं से भीगे होते हैं. हम बस इतना ही कहेंगे.

मेरे महबूब
ज़िन्दगी की
किताब का
हर वो वर्क़
आंसुओं से भीगा मिला
जहां तुम्हारा नाम लिखा था...
-फ़िरदौस ख़ान


आख़िरी मुलाक़ात

फ़िरदौस ख़ान
आज कितने अरसे के बाद उसे देखा था. शायद पांच साल के बाद, पांच साल नहीं बल्कि पांच सदियों के बाद. उसके बिना एक-एक पल गुज़ारना मेरे लिए किसी क़यामत से कम न था. उसे देखते ही में बीते वक़्त की यादों में खो गई.
मैंने उसके बिना जीने की आदत डाल ली थी, यह सोचना ख़ुद को धोखा देना भर था. कुछ पल के लिए मेरी नज़र उसके चेहरे पर टिक गई. क्या वह साहिर ही था? या फिर मेरी नज़रों का धोखा, जो हमेशा साहिर को ही ढूंढा करती थीं.
पीला चेहरा, उदास आंखें, कमज़ोर-सा जिस्म. जैसे हर तूफ़ान से टकराने की पहाड़ जैसी ताक़त, हिम्मत और जोश उसका साथ छोड़ गए हों. किसी ने उसके होंठों की सदाबहार मुस्कराहट छीन ली हो. और उसके कंठ में दर्द और उदासी भरे गीत भर दिए हों.
वह तो ऐसा न था. क्या हो गया उसे? क्या मेरे वियोग ने उसका यह हाल बना दिया है? क्या मेरी तरह वह भी हर पल तड़पा है अपना प्यार खोकर? कितने ही ऐसे सवाल थे जो किसी भी तरह मुझे चैन नहीं लेने दे रहे थे. मैं उससे मिलने के लिए दीवानगी की हद तक पागल हुए जा रही थी, लेकिन लोक-लाज की बेड़ियों ने मेरे पांव जकड़ रखे थे. मेरे कान उसकी आवाज़ सुनने को तरस गए थे. कुछ देर के बाद वो वक़्त भी आया जब मंच संचालक महोदय ने उसे मंच पर आमंत्रित कर गीत सुनाने का अनुरोध किया. उसकी नज़रें मेरी ही तरफ़ थीं. हमेशा की तरह उसने अपनी दिलकश आवाज़ में गीत शुरू किया. गीत बेहद उदासी भरा था. गीत का एक-एक लफ़्ज़ मेरी रूह की गहराई में उतर गया. मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद आंसू मेरे गालों पर ढलक आए थे. ख़ुद को औरों की नज़रों से बचाते हुए मैंने आंसू पोंछे. परिवार के लोग साथ होने की वजह से मुशायरे के बाद भी मेरी उससे मुलाक़ात न हो सकी.
चांद-सितारे, बहती ठंडी हवा सब कुछ मुझे ज़्यादा उदास कर रहे थे. नींद आंखों से कोसों दूर जा चुकी थी. रात क़यामत की रात जैसी लग रही थी, जो बीतने का नाम ही नहीं ले रही थी. करवटें बदल-बदल कर मैंने रात गुज़ारी.
मौक़ा मिलते ही मैं उसके घर की तरफ़ आ गई. दरवाज़ा खुला था. घर में शायद वह अकेला ही था. घर काफ़ी गंदा हो गया था. दीवारों पर जहां-तहां जाले लगे हुए थे. मेज़ और अलमारी पर भी काफ़ी धूल जमी थी. लगता था कि पांच बरस पहले ही घर की सफ़ाई की गई थी. वह अपने बिस्तर पर बेसुध पड़ा था. पास ही रखी मेज़ पर कुछ दवाइयां बिखरी पड़ी थीं. मेरे क़दमों की आहट सुनकर उसने आंखें खोलीं. वह काफ़ी कमज़ोर हो गया था. शायद वह बीमार था. मुझे देखकर वह उठ बैठा.
"कैसे हो तुम?" मैंने कुर्सी पर बैठते हुए उससे पूछा.
"ठीक हूं. देख तो रही हो तुम." उसने मुस्कराते हुए जवाब दिया, लेकिन उसकी मुस्कराहट के पीछे  एक गहरी उदासी थी.
"कब आए?"
"कल शाम ही लौटा हूं."
"अकेले ही आए हो?" मैंने न चाहते हुए भी पूछ लिया.
"क्या मतलब? किसे साथ लाता? "उसने सवालिया नज़रों से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा.
"मैंने सोचा तुमने शादी कर ली होगी."
"शादी!!!" वह हंस दिया. "शादी तो दो दिलों के मिलन और ख़ुशी का नाम है. क्या तुम ख़ुश नहीं हो?" उसने मेरे मुरझाये चेहरे को देखते हुआ पूछा.
क्या जवाब देती में उसके इस सवाल का. दोनों जहां में कोई में ऐसी चीज़ न थी, जो मुझे वो  ख़ुशी और सुकून दे सकती हो, जो मैंने उसके सानिंध्य में पाया था.
साहिर से मेरी पहली मुलाक़ात एक मुशायरे में हुई थी. उसने एक बहुत ही दिलकश रूमानी गीत सुनाया था.वो गीत मेरे दिलो-दिमाग़ पर इस क़द्र छा गया था कि उठते-बैठते हर वक़्त उस गीत के बोल मेरे कानों में गूंजते रहते. "अगर कोई मुझ पर ऐसा गीत लिखे तो मैं अपनी तमाम सांसें उसके नाम कर दूं". मैंने आईने के सामने खड़े होकर अपने बाल संवारते हुए ख़ुद से कहा था.
मैं हर उस मुशायरे में जाने लगी, जहां साहिर होता था. मेरा मेलजोल बढ़ता गया. मुलाक़ात से शुरू हुई हमारी जान-पहचान कब चाहत में बदल गई, पता ही न चला. अब उसने मुझ पर गीत लिखने शुरू कर दिए थे.  मेरी मनचाही मुराद मुझे मिल गई थी. एक दिन वह मेरा हाथ मांगने मेरे घर भी आया था. मेरे घरवालों ने इस रिश्ते को ठुकरा दिया था, क्योंकि उनके लिए लड़के से ज़्यादा उसका ख़ानदान अहमियत रखता था. हमारी चाहत के दरम्यान मेरे ऊंचे ख़ानदान की बहुत बड़ी दीवार थी, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था. लेकिन वह मेरे लिए कुछ भी करने को तैयार था. साहिर से  मेरे मिलने-जुलने पर सख़्त पाबंदी लगा दी गई.
आफ़ाक़ नाम के एक लड़के से मेरी मंगनी कर दी गई. लड़का विदेश में पढ़ने के लिए चला गया था. इसलिए शादी की बात भी कई साल के लिए टल गई थी.  एक दिन मुझे पता चला कि साहिर बीमार है. मुझसे रहा न गया. मैं उससे मिलने के लिए बेचैन हो उठी. सहेली के घर जाने के बहाने साहिर से मिलने का मौक़ा ढूंढ ही लिया, लेकिन उसी वक़्त आफ़ाक़ के परिवार के लोग आ गए.  मुझे मजबूरन घर पर ही रहना पड़ा. लेकिन इस दौरान मेरे दिल पर जो गुज़री, उसे बस दिल ही जनता था. मैं शोकेस में रखी बेजान गुड़िया बनकर रह गई थी, जिसके न तो अपने कोई जज़्बात होते हैं और न ही इन्द्रधनुषी सपने. मैं तो उस गुड़िया की तरह थी, जिसे दुकानदार संभाल कर रखता है और जब उसका कोई ख़रीदार आता है तो कुछ क़ीमत के बदले गुड़िया उसे सौंप देता है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि दुकानदार को गुड़िया की क़ीमत मिलती है, जबकि मेरे परिजनों को मेरी शादी पर काफ़ी दौलत ख़र्च करनी थी. मेरा ख़ुद का वजूद कहां था? मैं नहीं जानती. मुझ पर पहले मेरे परिजनों का हक़ था और अब यही हक़ ससुराल वालों का होने वाला था, जैसे मैं कोई इंसान न होकर जायदाद थी. मैं आफ़ाक़ की अमानत कही जाने लगी थी, जबकि मेरे रोम-रोम में साहिर का प्यार बसा था.  मैं पूरी तरह न तो आफ़ाक़ की हो सकती थी और न ही साहिर की. मैं किसे अपना कहती? मेरा तो ख़ुद अपने जिस्म पर भी हक़ नहीं था.
"कहां खो गईं?"  उसने चाय कि ट्रे मेज़ पर रखते हुए कहा.
"कहीं नहीं."
उसने हमेशा की तरह चाय का एक घूंट भरकर कप मेरे आगे कर दिया. मैं कप थामती, इससे पहले ही उसने अपना हाथ खींच लिया. शायद उसे अपनी ग़लती का अहसास हो गया था कि अब ऐसा करने का उसका कोई हक़ न था. हम हमेशा ऐसे ही चाय पीते थे, एक-दूसरे की जूठी.
"इस कप पर मेरा हक़ है और मैं अपना यह हक़ किसी को भी नहीं दे सकती, तुम्हें भी नहीं."  मैंने उसके हाथ से कप लेते हुए कहा.
"कब तक रहोगे?"
"बस एक हफ़्ते के लिए ही आया हूं. इतवार को वापस नार्वे लौटना है."
उसकी इस बात से मुझे तकलीफ़ हुई.
"क्या कुछ और दिनों के लिए नहीं रुक सकते?"
"तुम कहो तो मैं सारी उम्र के लिए भी रुक सकता हूं."
मुझे लगा, वह अब भी ख़ुद पर मेरा हक़ मानता है.  मैं उससे रुकने के लिए कहकर भी क्या करती. मैं जानती थी कि हमारी आज की मुलाक़ात आख़िरी है. इसके बाद तो शायद ख़्वाबों में ही मिलना हो.
"एक बात कहूं नीलो, बुरा तो न मानोगी? उसके चेहरे पर एक गहरी उदासी छा गई थी.
"कहो" -मैंने कहा. मुझ पर सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ है. मेरे गीत, मेरे जज़्बात, मेरे सपने सब तुम्हारे हैं. मैं तुम्हारा यह हक़ कभी भी किसी को नहीं दूंगा. यह मेरा वादा है तुमसे."  वह एक सांस में कहता जा रहा था. मेरे लिए क्यों वह अपनी ज़िन्दगी तबाह करने पर तुला हुआ था. मैं जानती थी. उसके बग़ैर मैं भी कहां आबाद रह गई थी.
मुझे अपनी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं रह गई थी, क्योंकि इस ज़िंदगी में मैंने साहिर को पाया था. यह बात अलग थी कि हमारा साथ सिर्फ़ यहीं तक का था. इसके आगे हमारे रस्ते अलग-अलग थे. हमारी आंखें नाम थीं. शाम ढल चुकी थी, बिलकुल मेरी ज़िंदगी की ख़ुशियों की तरह. मैंने साहिर से विदा ली, वो भी उम्रभर के लिए...  

एक शायर ने ठीक ही कहा है-
मिलना था इत्तेफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो इतना दूर हो गया जितना क़रीब था 


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17 Response to "आख़िरी मुलाक़ात"

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen says:
    2 जनवरी 2011 को 4:26 pm

    बहुत खूब कहानी है. बेहद रोचक और दिल को छूने वाली.

  2. वन्दना says:
    2 जनवरी 2011 को 4:40 pm

    उफ़!निशब्द हूँ।

    आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (3-1-20211) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.uchcharan.com

  3. मौसम says:
    2 जनवरी 2011 को 5:09 pm

    प्रिय फ़िरदौस
    हम आपको यूं ही हुस्न और कलाम की मलिका नहीं कहते.
    वाक़ई आज आपने एक बार फिर रुला दिया. आप जानती हैं हम बरसों से आपके कलाम के मुरीद हैं. सच कहें तो हमें आपकी एक-एक ग़ज़ल और नज़्म मुंह ज़बानी याद है. आपके लिए हमारी दीवानगी का आलम आप कभी समझ ही नहीं सकतीं. आपने हमारे कहने पर कहानी पोस्ट की. इसके लिए हम आपके शुक्रगुज़ार रहेंगे. आपके लफ़्ज़ों में इतनी तासीर है कि सीधे रूह की गहराई में उतर जाते हैं. एक बार आपसे मुलाक़ात के ख्वाहिशमंद हैं. अगर आप इजाज़त दें तो. हमें इसी साल हिन्दुस्तान आना है.

  4. फ़िरदौस ख़ान says:
    2 जनवरी 2011 को 5:16 pm

    @भारतीय नागरिक
    और वन्दना जी आपका शुक्रिया...

  5. फ़िरदौस ख़ान says:
    2 जनवरी 2011 को 5:19 pm

    सईद साहब
    यह आपकी ज़र्रानवाज़ी है, वरना हम इस क़ाबिल कहां हैं... हम लफ़्ज़ों को लिखते नहीं, बल्कि जीते हैं...
    आप हिन्दुस्तान आइये...स्वागत है...इंशाअल्लाह मुलाक़ात होगी...

  6. GirishMukul says:
    2 जनवरी 2011 को 5:44 pm

    जी यहीं एक अजीब स्थितियां जन्म लेतीं हैं छुटकी
    अच्छा लिखा बधाई

  7. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    2 जनवरी 2011 को 10:25 pm

    कहानी पढ़कर जनाब बशीर बद्र साहब के दो शेर याद आ रहे हैं-
    ये कसक दिल की दिल में चुभी रह गई
    ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गई
    एक मैं, एक तुम, एक दीवार थी
    ज़िन्दगी आधी-आधी बंटी रह गई...

    आपने बहुत अच्छा लिखा है...
    नए साल की मुबारकबाद.

  8. Sadhana Vaid says:
    3 जनवरी 2011 को 8:02 am

    उफ़ ! कितनी दर्दभरी और दुनिया की कठोर हकीकतों से भरी कहानी है ! दिल को गहराई तक झकझोर गयी ! साहिर और नीलो दोनों पात्र इतने सजीव हैं कि लगता है हमारे आस-पास ही कहीं नजर आ जायेंगे ! बहुत ही खूबसूरत कहानी है ! मेरी बधाई एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार करें !

  9. रश्मि प्रभा... says:
    3 जनवरी 2011 को 9:34 am

    dil ke andar tak saare ehsaas pahunche

  10. Er. सत्यम शिवम says:
    3 जनवरी 2011 को 10:06 am

    छु गयी मेरे दिल को...क्या बात है बहुत ही सुंदर रचना....

    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए...

    *काव्य- कल्पना*:- दर्पण से परिचय

    *गद्य-सर्जना*:-जीवन की परिभाषा…..( आत्मदर्शन)

  11. rashmi ravija says:
    3 जनवरी 2011 को 3:00 pm

    इन ऊँचे खानदान की झूठी शान तले कितने ही कोमल दिलो के अरमान दम तोड़ देते हैं...
    बहुत ही मार्मिक कहानी है....

  12. संजय भास्कर says:
    3 जनवरी 2011 को 6:52 pm

    आपने बहुत अच्छा लिखा है...
    नए साल की मुबारकबाद....

  13. सुशील बाकलीवाल says:
    4 जनवरी 2011 को 12:03 pm

    मिलना था इत्तेफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
    वो इतना दूर हो गया जितना क़रीब था

    इससे आगे क्या कहूँ । बेहतरीन रचना...

  14. रचना दीक्षित says:
    10 जनवरी 2011 को 1:26 pm

    कहानी दिल को गहराई तक झकझोर गयी

  15. हरकीरत ' हीर' says:
    10 जनवरी 2011 को 6:51 pm

    "एक बात कहूं नीलो, बुरा तो न मानोगी? उसके चेहरे प् एक गहरी उदासी छा गई थी.
    "कहो" -मैंने कहा. मुझ पर सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ है. मेरे गीत, मेरे जज़्बात, मेरे सपने सब तुम्हारे हैं. मैं तुम्हारा यह हक़ कभी भी किसी को नहीं दूंगा. यह मेरा वादा है तुमसे."

    बस यहाँ आकर आपने रुला दिया .....

  16. फ़िरदौस ख़ान says:
    10 जनवरी 2011 को 7:05 pm

    @हरकीरत 'हीर'
    दिल से कहानी पढ़ने के लिए शुक्रिया...
    सभी हमसे यही कहते हैं कि हम उन्हें रुला देते हैं...
    क्या करें...कुछ लफ़्ज़ ऐसे ही होते हैं, जो सीधे दिल में उतर जाते हैं...

  17. Kajal says:
    30 अगस्त 2011 को 10:19 pm

    मुझ पर सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ है. मेरे गीत, मेरे जज़्बात, मेरे सपने सब तुम्हारे हैं. मैं तुम्हारा यह हक़ कभी भी किसी को नहीं दूंगा. यह मेरा वादा है तुमसे."
    Ye baat kisi ne kahi thi mujhse...wo kisi or ke ho chuke or Aaj Eid ke din unse hui akhri mulaqat yaad aa rahi hai jab unki aankho mai aansu the....Allah se yehi dua hai ki wo khush rahe..aaj bhi unke purane khato ko padhkar zindagi kaat rahi hu or najane kabtak waqt imtehaan lega bas ek hi guzarsih hai uperwale se ki ye dam unki bahon mai nikle unse koi shikayat na hogi fir...

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