परछाइयां...


ज़िन्दगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ़ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है...हालांकि...आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक दायरे में समेट दिया है...मोबाइल, इंटरनेट के ज़रिये सात समन्दर पार किसी भी पल किसी से भी बात की जा सकती है... इसके बावजूद इंसान बहुत अकेला दिखाई देता है...बहुत अकेला...क्योंकि भौतिकतावाद ने 'अपनापन' जैसे जज़्बे को कहीं पीछे छोड़ दिया है... शायद, इसीलिए, लोग अब परछाइयों (वर्चुअल दुनिया) में रिश्ते तलाशने लगे हैं...

वाल्ट व्हिटमेन के शब्दों में " ओ राही! अगर तुझे मुझसे बात करने की इच्छा हुई, तो मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं...
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विज्ञापन डराते हैं


टीवी पर दिनभर में जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनमें ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है, जिनमें लोगों को इतनी बुरी तरह डराया जाता है कि वे विज्ञापन ख़त्म होते ही उनके उत्पाद ख़रीदने के लिए दौड़ पड़ें... हाथ धोने से लेकर नहाने तक और बर्तन धोने से लेकर फ़र्श साफ़ करने तक के उत्पादों के विज्ञापनों में कीटाणुओं का डर दिखाया जाता है कि अगर फ़लां उत्पाद इस्तेमाल न किया, तो उनका बच्चा बीमार हो जाएगा...
शुक्र है कि ये विज्ञापन कीटाणुओं के संपूर्ण नाश के लिए कोई कीटनाशक पीने की सलाह नहीं देते...
यह हिंदुस्तान है, जहां धरती को मां कहकर पुकारा जाता है... गांव-देहात में आज भी चोट लगने पर बच्चे और बड़े अपने ज़ख़्म पर मिट्टी डाल लेते हैं...

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भ्रष्टाचार कहां नहीं है...

एक वाक़िया पेश है... कई साल पहले की बात है... एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार ने अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए इनामी योजना शुरू की... बड़े इनामों में एक कार, स्कॊलर्शिप (लाखों में), मोटरसाइकिलें और छोटे इनामों में कांच के चार गिलास शामिल थे... इस इनामी योजना की वजह से अख़बार की प्रसार संख्या काफ़ी बढ़ गई... ये इनाम जिन्हें मिलने थे, उन्हें ही मिले... यानी कार मिली अख़बार के मालिक के दामाद को... स्कॊलर्शिप मिली अख़बार के मालिक के चहेते संपादक के भतीजे को (क्योंकि तब संपादक की इकलौती संतान गोद में थी), मोटरसाइकिलें मिलीं अख़बारों के उन एजेंटों को, जो मोटी रक़म के विज्ञापन लाते थे...
अब बचे गिलास, तो कुछ गिलास अख़बार में काम करने वालों ने अपने परिचितों को दिलवा दिए... और बचे-खुचे गिलास पाठकों को इनाम के तौर पर दे दिए गए...
हर जगह यही हाल है...

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ईमानदार नेता...


कई साल पहले की बात है... हमारे मामा जान एक क़िस्सा सुना रहे थे... उनके किसी दोस्त ने उनसे कहा कि उन्हें एक सरकारी काम है और दूसरे शहर फ़लां नेता के पास जाना है... अगले रोज़ मामा जान अपने दोस्त के साथ उस नेता के घर पहुंच गए... उस नेता का घर बहुत मामूली था... घर देखकर उनके दोस्त ने मामा जान से कहा कि चलो वापस चलते हैं... मामा जान ने वजह पूछी, तो उनके दोस्त ने कहा कि यह नेता हमारा काम क्या ख़ाक कराएगा, जो अपने लिए कुछ नहीं कर पाया...
यानी नेता का घर आलीशान होना चाहिए... घर के बाहर दो-तीन शानदार गाड़ियां खड़ी होनी चाहिए...
ईमानदार नेताओं के बारे में यह है एक आम आदमी की सोच...

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मज़हब

कई साल पहले की बात है... हमारे दफ़्तर में एक लड़की आई... बहुत परेशान थी... उसकी मां सौतेली थी... उसके पास कोई काम नहीं था... हमसे उसकी जो मदद हुई, कर दी... उसे नौकरी मिल गई... उसे कभी कोई परेशानी होती, तो हमें बताती... उसके प्रेमी ने उसे धोखा दे दिया था... वह बहुत बुरी तरह टूट चुकी थी... अब वह शादी करके बस चाहती थी, ताकि अपने प्रेमी को भूल सके... अख़बारों में शादी के इश्तिहार देखा करती थी... फिर हमें बताती भी थी...
एक दिन वह हमारे पास आई और कहने लगी- डियर तुमने सॊरी कहना है...
हमने पूछा क्यों...?
कहने लगी कि मेरी दादी हमेशा कहा करती थीं कि मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं... और मैं भी बचपन से मुसलमानों से नफ़रत करती थी... लेकिन तुमसे मिलकर मुसलमानों के प्रति मेरा नज़रिया बदल गया... तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो...
कितनी सच्चाई से उसने अपनी बात कही... हम उसकी इस बात को कभी भुला नहीं पाए...

दरअसल, कुछ लोग अपने मज़हब के नाम पर इतना ज़हर उगलते हैं कि उनके उस मज़हब से ही नफ़रत होने लगती है... शायद उसकी दादी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ हो...?

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ग़ालिब का है अंदाज़-ए बयां और


फ़िरदौस ख़ान
ग़ालिब एक ऐसे शायर हुए हैं, जो अपनी बेहतरीन शायरी के लिए सदियों तक याद किए जाते रहेंगे. उनकी शायरी में ज़िंदगी के ख़ूबसूरत रंग हैं. ग़ालिब के बिना उर्दू शायरी अधूरी है. हिन्द पॉकेट बुक्स ने हाल में एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है ग़ालिब. इस किताब में उर्दू और फ़ारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के संक्षिप्त जीवन परिचय के साथ उनका चुनिंदा कलाम दिया गया है. किताब के संपादक प्रकाश पंडित ने इस किताब में फ़ारसी के शब्दों का हिंदी अनुवाद भी दिया है, जिससे पाठकों को शायरी को समझने में आसानी रहेगी. मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग ख़ां है. उनका जन्म 27 दिसंबर, 1797 को आगरा में मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग के घर हुआ. उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग ख़ान मध्य एशिया के समरक़ंद से अहमद शाह के शासनकाल में हिंदुस्तान आए थे. कुछ अरसे तक वह दिल्ली, लाहौर और जयपुर में रहे. लेकिन बाद में उन्होंने आगरा में बसने का फ़ैसला किया और फिर यहीं के होकर रह गए. उनके दो बेटे और तीन बेटियां थीं. उनके बेटों के नाम मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग ख़ान और मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग ख़ान थे. मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग ने इज़्ज़त-उत-निसा बेगम से निकाह किया और अपनी ससुराल में रहने लगे. उन्होंने लखनऊ के नवाब और हैदराबाद के निज़ाम के पास काम किया. 1803 में अलवर में जंग के दौरान उनकी मौत हो गई. उस व़क्त ग़ालिब महज़ पांच साल के थे. उनकी परवरिश उनकी ननिहाल में हुई. उनकी तालीम उर्दू और फ़ारसी में हुई. ईरान के मशहूर विद्वान अब्दुल समद ने उन्हें फ़ारसी और अदब की तालीम दी. अब्दुल समद दो साल के लिए आगरा आए थे और वह ग़ालिब से बहुत प्रभावित थे. महज़ 13 साल की उम्र में नवाब इलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से उनका निकाह हो गया. शादी के कुछ वक़्त बाद वह दिल्ली आ गए और तमाम उम्र यहीं रहे. वह गली क़ासिमजान में रहते थे. दिल्ली में शायराना माहौल था. आए दिन शेअरों-शायरी की महफ़िलें जमा करती थीं. वह भी मुशायरों में शिरकत करते और अपने उम्दा कलाम की बदौलत मुशायरें लूटा करते. पहले वह असल उपनाम से लिखते थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना उपनाम ग़ालिब रख लिया. उर्दू शायरी में उस्ताद-शार्गिद की परंपरा है, लेकिन वह किसी के शागिर्द नहीं थे. वह अपने आलोचक ख़ुद ही थे. ग़ालिब मशहूर शायर बेदिल से बहुत मुतासिर थे और उन्हीं से प्रभावित होकर उन्होंने तक़रीबन दो हज़ार शेअर लिख दिए.
अपनी शायरी के ख़ूबसूरत अंदाज़ की वजह से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान क़ायम की. वह ख़ुद कहते हैं-
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए बयां और

ग़ालिब के ज़माने में उर्दू शायरी इश्क़, मुहब्बत, विसाल, हिज्र और हुस्न की तारीफ़ों तक सिमटी हुई थी. उन्होंने यह सब पसंद नहीं था. इस बारे में वह कहते हैं-
बक़द्रे-शौक़ नहीं ज़र्फे-तंगनाए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयां के लिए

उन्होंने अपनी शायरी में ज़िंदगी के दूसरे रंगों को भी शामिल किया. उनकी शायरी में फ़लस़फा है. हालांकि उस वक़्त कुछ लोगों ने उनका मज़ाक़ भी उड़ाया, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की. वह कहते हैं-
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में माने, न सही

मिर्ज़ा ग़ालिब मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी शायर भी रहे. शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद्दौला के ख़िताब से नवाज़ा. बाद में उन्हें मिर्ज़ा नोशा के ख़िताब से भी सम्मानित किया गया. वह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में महत्वपूर्ण दरबारी थे. उन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के ब़डे बेटे फ़क़रुद्दीन मिर्ज़ा का शिक्षक तैनात किया गया. इसके अलावा वह म़ुगल दरबार के शाही इतिहासकार भी रहे.

उनकी ज़्यादातर ज़िंदगी मुफ़लिसी में गुज़री. वह बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति थे. उन्होंने अपने स्वाभिमान के आगे कभी समझौता नहीं किया. एक मिसाल पेश है. 1852 में उन्हें नौकरी का बुलावा आया. दिल्ली कॉलेज में उन्हें फ़ारसी का प्रमुख शिक्षक बनाया गया था. अपनी तंगहाली को देखते हुए उन्होंने यह प्रस्ताव मंज़ूर कर लिया. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के सचिव टॉमसन ने बुलावा भेजा था. मिर्ज़ा ग़ालिब पालकी में बैठकर उनके बंगले पर पहुंच गए. अंदर कहलवा भेजा और इंतज़ार करने लगे, लेकिन साहब उनके स्वागत के लिए बाहर नहीं आए. इससे ग़ालिब के आत्मसम्मान को ठेंस पहुंची और उन्होंने उसी वक़्त कहारों को आदेश दिया कि पालकी वापस अपने घर लौटा ले चलो. जब टॉमसन को उनकी नाराज़गी के बारे में पता चला तो उन्होंने ग़ालिब को समझाना चाहा कि वह ख़ास मुलाक़ाती तो हैं नहीं, ताकि बाहर आकर उनका स्वागत किया जाता, वह तो नौकरी के लिए आए हैं. इस पर मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा कि जनाबे आली, अगर नौकरी का मतलब यह है कि इससे इज्ज़त में कमी आ जाएगी, तो ऐसी नौकरी मुझे मंज़ूर नहीं. उन्होंने आदाब बजाया और पालकी में सवार होकर लौट गए. ऐसे से मिर्ज़ा ग़ालिब. उन्होंने कई मुसीबतों का सामना किया, लेकिन कभी किसी से मदद नहीं मांगी. उन पर क़र्ज़ इतना था कि उनका घर से बाहर निकलना दुश्वार हो गया. अपनी ख़स्ता हालत में भी वह ज़िंदादिल रहे. वह कहते हैं-
क़र्ज़ की पीते थे लेकिन समझते थे कि
हां रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ामस्ती इक दिन

ग़ालिब की शायरी में ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त भी है और रूहानी का जज़्बा भी. बानगी देखिए-
बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता
तेरे वादे पर जिये हम तो यह जान झूठ जाना
कि खु़शी से मर न जाते अगर एतबार होता

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाले-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूं सवाबे-ताअतो-ज़हद
पर तबीअत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात, जो चुप हूं
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
क्यों न ची़खूं कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़े-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ऐ चारागर, नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है, पर नहीं आती
काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती

मैं उन्हें छे़डू, और कुछ न कहें
चल निकलते जो मय पिये होते
क़हर हो या बला हो जो कुछ हो
काश कि तुम मेरे लिए होते
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब कई दिए होते
आ ही जाता वो राह पर ग़ालिब
कोई दिन और भी जिए होते

दिले नादां, तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही, ये माजरा क्या है
मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूं
काश, पूछो कि मुद्दा क्या है

ग़ालिब की ज़िंदगी परेशानियों में बीती. उनके सात बच्चे हुए, लेकिन कोई भी ज़िंदा नहीं रह पाया. उनकी ज़िंदगी का आख़िरी हिस्सा भी बीमारी में गुज़रा. उन्होंने लिखा-मेरे मुहिब, मेरे महबूब तुमको मेरी ख़बर भी है? पहले नाजवां था, अब नीम जान हूं. आगे बहरा था, अब अंधा हुआ जाता हूं. जहां चार सतरें लिखीं, उंगलियां टेढ़ी हो गईं. हरूफ़ सजने से रह गए. इकहत्तर बरस जीया, बहुत जीया, अब ज़िंदगी बरसों ही नहीं, महीनों और दिनों की है. उनका लिखा सच हो गया और इस तहरीर से कुछ दिन बाद यानी 15 फ़रवरी, 1869 को वह इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख्सत हो गए.
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाए कि हम बतलाएं क्या... (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : ग़ालिब
संपादक : प्रकाश पंडित 
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 110 रुपये

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नज़रिया...


अकसर छोटी-छोटी चीज़ें ज़िंदगी का नज़रिया बदल देती हैं... हमारी मम्मा सब्ज़ी, फलों के छिलके और सूखी रोटी कभी कूड़ेदान में नहीं डालतीं... इन्हें वह दरवाज़े के बाहर सड़क पर एक तरफ़ रखवा देती हैं... जिसे गायें खा लेती हैं... हमारे इलाक़े में बहुत-से आवारा पशु हैं, जो भूख लगने पर अकसर कूड़ा-कर्कट खाते देखे जाते हैं... सब्ज़ियों, फलों के छिलकों और सूखी रोटी को देखते ही ये खाने के लिए आ जाते हैं...
मम्मा की देखा-देखी अब गली की और महिलाएं भी ऐसा करने लगी हैं... हमारे यहां कचरा उठाने वाला हर रोज़ नहीं आता... ऐसे में सब्ज़ियों और फलों के छिलके बाहर डालने से जहां आवारा पशुओं का कुछ भला हो जाता है, वहीं छिलकों से कूड़ेदान का कूड़ा भी सड़ता नहीं है...
अब तो गली के कोने पर बिजली के खंबे के पास एक जगह बन गई है, जहां कुछ लोग हरा चारा भी लाकर डाल देते हैं...
जो चीज़ें हमारे काम की नहीं होतीं, उन्हें कूड़ेदान में फेंकने की बजाय उनका किसी ऐसी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां उनकी ज़रूरत हो...
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सिल-बट्टे...


बाज़ार में तरह-तरह की नामी कंपनियों के tomato ketchup और saus मिल जाएंगे... लेकिन जो ज़ायक़ा घरों में सिल-बट्टे पर बनने वाली टमाटर, अदरक, लहसुन, हरी मिर्च और हरे धनिये की चटनियों में है, वह कहीं और नहीं मिलेगा...
हालांकि अब घर-घर grinder mixer आ गए हैं... बाज़ार में भी हल्दी, मिर्च, धनिया से लेकर गरम मसाले तक पिसे हुए मिलने लगे हैं... लेकिन आज भी ऐसे घरों की कमी नहीं, जहां सभी मसाले सिल-बट्टे पर पीसे जाते हैं... हमारी नानी जान भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसा करती थीं... उनका कहना था कि खाने में जो ज़ायक़ा और ख़ुशबू सिल-बट्टे पर पिसे मसालों से आता है, वह grinder mixer में पिसे मसालों से नहीं आ पाता... हमारी एक मामी और उनकी बेटियां भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसती हैं... हालांकि इसमें मेहनत ज़्यादा है और वक़्त भी काफ़ी लग जाता है... लेकिन जिन्हें सिल-बट्टे के मसालों का ज़ायक़ा लग जाए, फिर कहां छूटता है...  हमारे घर में भी सिल-बट्टे वाली चटनी ही पसंद की जाती है... नोएडा में सिल-बट्टा ख़रीदने के लिए हमें बहुत घूमना पड़ा था... पुरानी दिल्ली में तो बहुत आसानी से मिल जाते हैं...

सिल- बट्टे को सही रखने के लिए इसे छेनी हथौड़ी से तराशा जाता है... गांव-क़स्बों में यह काम करने वाले गली-मुहल्लों में आवाज़ लगाते मिल ही जाते हैं... मगर बाज़ार मे मिलने वाले पिसे मसालों और grinder mixer की वजह से इन लोगों काम ख़त्म होता जा रहा है...

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ज़िंदगी और मुहब्बत...



  • ज़िंदगी का मौसम भी कभी एक जैसा नहीं रहता... बहार के बाद ख़िज़ा और... ख़िज़ा के बाद बहार आती ही है... कई बार ख़िज़ा ज़िंदगी के आंगन में अरसे तक ठहर जाया करती है... लेकिन बहार का इंतज़ार क़ायम रहता है... 
  • हर रोज़ की तरह आज फिर ज़िंदगी का एक और दिन ख़त्म हो गया... या यूं कहें कि उम्र की किताब का एक और कोरा वर्क़ ज़िन्दगी के अच्छे-बुरे वाक़ियात से भर गया... 
  • एक सुनहरे दिन के बाद स्याह रात आती है... चांदनी रातों के बाद अमावस की अंधेरी रातें आती है... यही क़ुदरत है... इसलिए उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए... 
  • तालीम उन लोगों की ज़िंदगी बदलती है, जो खुले ज़ेहन और रौशन दिमाग़ के होते हैं... वरना ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिन्हें देखकर लगता है कि उनकी पढ़ाई पर उनके वालदेन ने पैसा बस बर्बाद ही किया है... ऐसी तालीम का क्या फ़ायदा, जो इंसान को इंसानियत का सबक़ भी न पढ़ा पाए... 
  • इंसान को मालूम ही नहीं होता कि वह चाहता क्या है...? अपनी कुछ ख़्वाहिशों को पूरा करने की जद्दोजहद में वह उम्र गुज़ार देता है... फिर उसे अहसास होता है कि असल में उसे तो यह सब चाहिए ही नहीं था...
  • कई मर्तबा कितना भला लगता है किसी अनजान रास्ते पर चलते जाना, बिना यह परवाह किए कि वह कहां जा रहा है, और कहां नहीं... बस उस अनजानी राह पर चलते जाना है... 
  • जिससे मन जुड़ता है... उससे क़िस्मत क्यों नहीं जुड़ती...? 
  • हर रोज़ की तरह आज फिर ज़िंदगी का एक और दिन ख़त्म हो गया... या यूं कहें कि उम्र की किताब का एक और कोरा वर्क़ ज़िन्दगी के अच्छे-बुरे वाक़ियात से भर गया... 
  • वो सुबह कभी तो आएगी... अकसर इस इंतज़ार में ही उम्र की शाम हो जाती है... 
  • वक़्त के साथ ज़रूरतें... और ज़रूरतों के हिसाब से इंसान की पसंद-नापसंद भी बदलती रहती है... बदलाव तो क़ुदरत का दस्तूर है... 
  • हमेशा से तीन तबक़े रहे हैं... एक सही के साथ होता है... दूसरा ग़लत के साथ... और तीसरे को या तो सही-ग़लत के बारे में कुछ पता नहीं होता... या फिर उसमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह किसी एक तबक़े के साथ खड़ा हो सके... हमेशा से ऐसा होता रहा है... और आगे भी होता रहेगा...
  • कोई बड़े बंगले में रहता है, कोई छोटे से मकान में... कोई मिट्टी के कच्चे घर में, कोई छप्पर तले, कोई झुग्गी-झोपड़ी में, किसी को अपनी एक अदद छत तक नसीब नहीं है... तो क्या बड़े बंगले में रहने वाले को ख़ुद पर ग़ुरूर होना चाहिए... ? क्या उसे नाज़ करने का कोई हक़ नहीं, जिसके पास रहने के लिए बड़ा बंगला नहीं है... आख़िर में सभी को ख़ाक में ही मिल जाना है... फिर ग़ुरूर किस बात का... और क्यों...? 
  • ज़िंदगी तो फ़ानी है... एक दिन फ़ना हो जाएगी... हम अपनी ज़िंदगी में सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि कभी हमारे दम से किसी का अहित न हो... और जब मौत आए, तो दिल पर ये बोझ न हो कि हमने किसी का अहित किया है... बस इतना ही...जो बहुत है एक उम्र के लिए... 
  • ज़िंदगी में कोई मंज़िल हो, तो उम्र का सफ़र कट ही जाया करता है... मंज़िल मिले न मिले...
  • माज़ी अच्छा हो या बुरा... अकसर आंखें नम कर देता है...
  • बचपन से अब तक हमारी एक कैफ़ियत कभी नहीं बदली... हालांकि उम्र के साथ इंसान की बहुत-सी आदतें और पसंद-नापसंद बदलती रहती हैं...बचपन से ही जब भी हम किसी की मौत की ख़बर सुनते हैं, तो उस मरने वाले से जलन महसूस होती है... सोचते हैं कि काश ! उसकी जगह हम होते... ऐसा क्यों है, नहीं जानते... 
  • अपनी ज़िंदगी ख़ुदा को समर्पित कर दो, तो सब मुश्किलें आसान हो जाती हैं... ऐसा लगता है... जैसे बचपन लौट आया हो... क्योंकि बचपन में मांगने की कोई ज़रूरत ही नहीं होती... हमारे बड़ों को पता होता है कि हमें क्या चाहिए... और किसमें हमारी भलाई है... वो हमारी ज़रूरतें पूरी करते ही हैं...
  • नेकी कर, दरिया में डाल... इंसान को हमेशा नेकी करते रहना चाहिए... यानी जब भी किसी मुफ़लिस या मज़लूम की मदद का मौक़ा मिले, उसके काम आ जाना चाहिए... ना जाने ज़िंदगी की किस मुश्किल घड़ी में उसकी दुआएं काम आ जाएं...
  • कुछ सवाल न कभी पूछे जाते हैं... और न ही कभी उनके जवाब दिए जाते हैं... फिर भी बात मुकम्मल हो जाया करती है...
  • काश ! ज़िन्दगी की राह में भी ’यू टर्न’ हुआ करते...
  • एक रोज़ ज़िन्दगी मौत की आग़ोश में सो जाएगी...
  • कांटे... कांटे ही हुआ करते हैं... वो फूलों की जगह कभी नहीं ले सकते... वो न किसी सेहरे के फूल बनते हैं...और न ही उनसे कोई सेज सजाता है...
  • इंसान जब बहुत कुछ कहना चाहता, अकसर तभी ज़ुबान ख़ामोश हुआ करती है... 
  • काश ! उसने हमें पहले ढूंढ लिया होता...
  • ज़िन्दगी के सफ़र में कोई किसी का साथ नहीं निभाता... सबको अपने-अपने हिस्से का सफ़र अकेले ही तय करना होता है...
  • रूह जाविदां है, दाइमी है... फिर भी लोग चेहरों में उलझ जाया करते हैं... जिस्मानी ख़ूबसूरती तो कुछ वक़्त के लिए ही होती है, असल ख़ूबसूरती तो दिल की हुआ करती है, रूह की हुआ करती है...
  • हर ख़्वाब की ताबीर नहीं होती, लेकिन वो आंखों में बसते तो हैं... तुम भी तो एक ख़्वाब ही हो...
  • आज कुछ टूट कर बिखर गया... टूटना बुरा होता है और बिखरना उससे भी ज़्यादा बुरा...
  • इंसान कहीं भी जाए, वापस अपने घर ही आता है... फ़िक्र तो उसकी हुआ करती है, जिसका घर नहीं होता... 
  • शायद, कुछ लोग अज़ाब झेलने के लिए ही इस दुनिया में आते हैं...
  • ज़िन्दगी में अगर मुहब्बत शामिल हो, तो इंसान को सलीब पर टंगी ज़िन्दगी भी उतनी बुरी नहीं लगती...
  • काश ! हम अपनों की सारी तकलीफ़ अपनी ऊपर ले लिया करते, तो कितना अच्छा होता...
  • कुछ लोग ऐसे हुआ करते हैं, जिनसे मिलकर ज़िंदगी ख़ुशनुमा हो जाती है...
  • इंसान मिटने के बाद ही संवरता है, जैसे जिस्मानी मौत के बाद रूहानी ज़िन्दगी मिलती है...
  • दुनिया की नज़र में इंसान सिर्फ़ एक बार मरता है, जबकि हक़ीक़त में वो कई मर्तबा मरता है...
  • ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा तकलीफ़ भी वही देता है, जिसे ये मालूम होता है कि आपकी ज़िन्दगी में उसके सिवा कुछ भी नहीं है...
  • ज़िन्दगी में मुहब्बत हो, तो ज़िन्दगी सवाब होती है... 
  • अक़ीदत और मुहब्बत के मामले में दिल की ही जीत हुआ करती है...
  • जो शख़्स ख़ुद टूटा हुआ, बिखरा हुआ है, वो किसी को क्या ख़ुशी देगा...
  • इंसान जब किसी से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करने लगता ह, तो वो उसे खोने से डरता है... अकसर यही डर शंका की वजह बन जाया करता है...
  • लड़की डूब रही है... उसकी सांसें अब थमने लगी हैं... हर तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी है... दूर-दूर तलक कहीं कोई किनारा नज़र नहीं आ रहा है... 
  • कुछ चीज़ों का वजूद शायद नामुकम्मल रहने में ही है...
  • अमूमन, हक़ीक़त में ज़िन्दगी बेरंग ही हुआ करती है... रंग-बिरंगे तो सिर्फ़ ख़्वाब ही हुआ करते हैं...
  • वो लोग ख़ूबसूरत होते हैं, जिनकी आंखों में मुहब्बत होती है, जिनकी बातों में मिठास होती हैं... और इस ख़ूबसूरती के लिए ब्यूटी पार्लर जाने की ज़रूरत नहीं...
  • कुछ लोगों को क़तरा-क़तरा भी नहीं मिलती ’ज़िन्दगी’...
  • कहते हैं- सब्र का फल मीठा होता है...लेकिन ज़्यादा सब्र करने से अकसर फल सड़ भी जाते हैं...
  • कुछ लम्हे ऐसे हुआ करते हैं, जब लगता है कि सबकुछ पा लिया... मगर अगले ही पल अहसास होता है कि कुछ मिलने से पहले ही सबकुछ खो गया...
  • जहां मुहब्बत हुआ करती है, वहां फिर किसी और चीज़ के लिए जगह ही नहीं रहती...
  • वो ख़ुदा तो नहीं, मगर उसे देखकर कलमा पढ़ने को जी चाहता है...
  • ज़िन्दगी ! तुझसे इतने बेज़ार पहले तो कभी न थे...
  • मेरी ज़िन्दगी वो गुमशुदा ख़त है, जिसका पता तुम हो...
  • ज़िन्दगी में ऐसा भी मु़क़ाम आता है, जब किसी से कोई शिकायत नहीं रहती...
  • कुछ वाक़ियात, कुछ लोग और कुछ बातें इंसान की ज़िंदगी बदल दिया करती हैं...
  • गुज़श्ता साल के साथ कई ऐसी चीज़ें घर से बाहर कर दीं, जिनसे हमेशा तकलीफ़ होती थी, चुभन होती थी... नये साल में कुछ अच्छा होगा या नहीं,  ये नहीं जानते... हां, इतना ज़रूर मालूम है कि अब पुरानी चीज़ें तकलीफ़ नहीं देंगी, चुभन नहीं देंगी...
  • कई बार मौत से मिलने को बहुत जी चाहता है... जी चाहता है कि उसकी गोद में सर रखकर सो जाएं, फिर कभी न उठने के लिए...
  • ज़िन्दगी... एक ऐसा सफ़र है, जिसकी मंज़िल ’मौत’ है...
  • कई बार मौत से मिलने को बहुत जी चाहता है... जी चाहता है कि उसकी गोद में सर रखकर सो जाएं, फिर कभी न उठने के लिए...
  • ज़िन्दगी की राह में जो लोग छूट जाते हैं, फिर वो कभी नहीं मिलते... क्योंकि ज़िन्दगी के रास्ते पर कभी यू टर्न नहीं होता...
  • सच के साथ तपते रेगिस्तान में गुज़ारे गए चंद लम्हे, झूठ के गुलिस्तां में गुज़ारी गई लम्बी उम्र से कहीं बेहतर हैं...
  • हर इंसान की अपनी अक़ीदत हुआ करती है... और हर इंसान को अपनी अक़ीदत के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने का पूरा हक़ है... हमें दूसरों की अक़ीदत की इज़्ज़त करनी चाहिए...हमने यही सीखा है... 
  • ज़िन्दगी के सफ़र में फूल और कांटे दोनों ही मिला करते हैं... फूलों को अपने दामन में समेट लेना चाहिए और कांटों को माज़ी में दफ़न कर देना चाहिए... ज़िन्दगी, मुसलसल आगे बढ़ते रहने का ही नाम है... कहीं ठहर जाने से ज़िन्दगी की रफ़्तार कम तो नहीं हो जाती... फिर क्यों ख़ुद को मज़ीद अज़ाब में झोंका जाए...
  • कुछ सफ़र ऐसे हुआ करते हैं, जिनकी कोई मंज़िल नहीं होती... इसलिए किसी भी राह पर सोच-समझकर ही क़दम बढ़ाना चाहिए... ज़िन्दगी में ऐसा भी होता है, रास्ते तो मिल जाते हैं, लेकिन मंज़िलें खो जाया करती हैं...
  • कुछ लोग भले ही जहां में रौशनी बिखेरते रहें, लेकिन उनकी अपनी ज़िन्दगी का अंधेरा कभी नहीं छंटता... 
  • उम्र की रहगुज़र में न जाने कितने बियांबान आते हैं, जिनमें अकसर ज़िन्दगियां खो जाया करती हैं... 
  • जब इंसान के नसीब में ख़ुशी न हो, तो ग़ैरों को फूल बांटने ’अपने’ भी नश्तर ही चुभोते हैं... और नेक आमाल के हामी रोज़े में भी दिल दुखाने से बाज़ नहीं आते...
  • ज़िन्दगी भी अजीब शय है... दुश्वारियां जीने नहीं देतीं और दुआएं मरने नहीं देतीं...
  • जो इंसान कमज़ोर लम्हों में किसी को अपना समझकर उसे अपनी ज़िन्दगी की महरूमियों की सच्चाइयां सौंप देता है, बाद में उसे बहुत पछताना पड़ता है...
  • कहते हैं- दुआओं से तक़दीरें बदल जाया करती हैं... काश ! हमारे लिए भी किसी ने ऐसे ही कोई दुआ की होती...
  • वो दुआएं कौन-सी हुआ करती हैं, जो आसमानों से हक़ीक़त बनकर उतर आती हैं... 
  • ज़िन्दगी में ऐसा भी मु़क़ाम आता है, जब किसी से कोई शिकायत नहीं रहती...
  • कुछ यादें जीने का सहारा हुआ करती हैं...
  • मुहब्बत न हो तो ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं... मुहब्बत क़ल्ब का सुकून है, रूह की राहत है...
  • मेरे महबूब ! तुम होते, तो ज़िन्दगी ख़ाक न होती...
  • तुम मेरी इबादतों में शामिल हो... मेरी दुआओं का मरकज़ हो...
  • ज़िन्दगी में दो तरह के लोग मिला करते हैं... पहले जो हमें ये बताते हैं कि हम उनके लिए कितने ख़ास हैं... ऐसे लोग ज़िन्दगी से मुहब्बत करना सिखाते हैं, ज़िन्दगी को भरपूर जीने का सलीक़ा बताते हैं... इनसे मिलकर ज़िन्दगी से मुहब्बत हो जाती है... दूसरी तरह के लोग हमें ये बताते हैं कि उनके पास हमसे भी ज़्यादा चाहने वाले लोग हैं... ऐसे लोग ज़िन्दगी के लिए बेरुख़ी पैदा कर देते हैं... इनसे मिलकर लगता है कि ज़िन्दगी कितनी बेमानी है...
  • कहते हैं कि ज़िन्दगी कभी किसी के लिए नहीं रुकती... लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है, ज़ाहिरी तौर पर भले ही ज़िन्दगी मुतासिर दिखाई न दे, लेकिन हक़ीक़ी तौर पर ज़िन्दगी, ज़िन्दगी कहां रह जाती है... घर के बाहर त्यौहार की रौनक़ें हैं, लेकिन घर के अंदर वही उदासियों का डेरा है...क्या ऐसे भी कोई त्यौहार मनाता है...
  • ज़िन्दगी ज़हर से भी ज़हरीली हो सकती है, कभी सोचा न था.
  • मेरी ज़िन्दगी वो गुमशुदा ख़त है, जिसका पता तुम हो...
  • कुछ लोगों की क़िस्मत में अज़ाब... अज़ाब... और सिर्फ़ अज़ाब ही लिखा होता है...
  • ज़िन्दगी में ऐसा भी वक़्त आया करता है, जब इंसान को न किसी ख़ुशी की चाह होती है और न ही किसी ग़म का ख़ौफ़...
  • ज़िन्दगी में कुछ ख़ालीपन ऐसा भी हुआ करता है, जिसे कोई नहीं भर पाता... लफ़्फ़ाज़ी से कुछ देर के लिए दिल बहलाया तो जा सकता है, लेकिन अधूरेपन को दूर नहीं किया जा सकता...
  • ख़ुशियां सबके नसीब में नहीं हुआ करतीं... कुछ लोग ऐसे भी हुआ करते हैं, जो एक ख़ुशी तक को तरस जाते हैं...
  • इंसान इस दुनिया में ख़ाली हाथ आया था... और ख़ाली हाथ ही उसे चले जाना है... बस उम्र के इस सफ़र में उसे कुछ यादें छोड़ जानी हैं...
  • लड़की को आधी-अधूरी चीज़ें अच्छी नहीं लगती थीं... लेकिन उसे ज़िन्दगी आधी-अधूरी ही मिली...
  • ज़िन्दगी की किताब के कुछ वर्क़ उन काग़ज़ों की तरह हुआ करते हैं, जिन्हें हवा के झोंके अपने साथ उड़ाकर ले जाते हैं... न जाने किस सिफ़्त, अनजान जगहों पर... जहां के नाम पते भी बेगाने हुआ करते हैं... 
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खाना बनाना...


दिल्ली में लड़कियों से यह बात सुनने को ख़ूब मिलती है कि उन्हें चाय बनानी तक नहीं आती... ऐसा कहने वाली लड़कियों में गांव-क़स्बों और छोटे शहरों से आने वाली वे लड़कियां भी शामिल हैं, जो दिल्ली में आकर पढ़ाई या नौकरी कर रही हैं... हमें आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि इसमें गर्व करने वाली कौन-सी बात है कि उन लड़कियों को चाय बनानी तक नहीं आती...
गर्व की बात तो यह होनी चाहिए कि उन्हें कई तरह की चाय बनानी आती है, वे किसी एक सब्ज़ी को कई तरीक़े से पका सकती हैं... उन्हें पंजाबी छोले-भठूरे से लेकर इडली-डोसा तक बनाना आता है... वे जितनी लज़ीज़ पूड़ी-कचौरी बना सकती हैं, उतना ही ज़ायक़ेदार मुग़लई खाना भी बना सकती हैं... उन्हें कई तरह के अचार और चटनियां बनानी आती हैं...
आज के दौर में लड़कियों की बात तो छोड़िये, लड़के भी अच्छा खाना बनाना जानते हैं... अकसर पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में लड़कों को घर से दूर रहना पड़ता है... ऐसे में वे कब तक बाहर का खाना खाएंगे... दिल्ली में दूर-दराज़ के इलाक़ों से आने वाले ज़्यादतर लड़के ख़ुद ही खाना बनाते हैं...
वैसे, भी अपनी मां के बाद ख़ुद बनाए गए खाने का ज़ायक़ा ही सबसे अच्छा होता है... यह बात हम अपने लिए कह रहे हैं...

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मेरे घर आई एक नन्ही परी...


आज हमारी परी यानी फ़लक (भतीजी) की पहली सालगिरह है... पिछले साल आज ही के दिन वह बहार बनकर हमारे घर आई थी... कितनी तैयारियां की गई थीं उसके लिए... कपड़े, दूधदानी, बेबी सोप, बेबी पाउडर, झूला, खिलौने और न जाने क्या-क्या ख़रीदा गया था... और इस सबसे बढ़कर उसके लिए एक प्यारा-सा नाम ढूंढना था... वाक़ई बड़ी ज़िम्मेदारी का काम था अपनी परी के लिए एक प्यारा-सा नाम सोचना... कहते हैं कि नाम का इंसान की ज़िंदगी पर बहुत असर पड़ता है... घर में सब यही चाहते थे कि नाम हम ही बताएं... आख़िरकार हमने पांच-सात नाम अपनी मम्मा को बता दिए,जिनमें से उन्हें फ़लक नाम पसंद आया...
बहरहाल... हम फ़लक को परी कहकर बुलाते हैं... उसके प्यार के नाम बहुत सारे हैं... सबके अपने-अपने...
सबसे ख़ास बात हमारी परी को गीत-संगीत बहुत पसंद है... आज दोपहर संतों की एक टोली गीत गाते हुए गली से गुज़री, तो वह बाहर जाने की ज़िद करने लगी... मम्मा ने उसके हाथों कुछ पैसे संतों को दिलाए... संतों ने उसे ढेर सारी दुआएं दीं और उसके माथे पर एक नन्हा-सा तिलक भी लगा दिया...
परी गाने बहुत ध्यान से सुनती है... ख़ासकर साहिर लुधियानवी साहब का यह गीत, जिसके बोल हमें अब और भी मीठे लगने लगे हैं...

मेरे घर आई एक नन्ही परी, एक नन्ही परी
चांदनी के हसीन रथ पे सवार
मेरे घर आई...

उसकी बातों में शहद जैसी मिठास
उसकी सांसों में इतर की महकास
होंठ जैसे के भीगे-भीगे गुलाब
गाल जैसे के बहके-बहके अनार
मेरे घर आई...

उसके आने से मेरे आंगन में
खिल उठे फूल, गुनगुनायी बहार
देखकर उसको जी नहीं भरता
चाहे देखूं उसे हज़ारों बार
मेरे घर आई...

मैंने पूछा उसे के कौन है तू
हंसके बोली के मैं हूं तेरा प्यार
मैं तेरे दिल में थी हमेशा से
घर में आई हूं आज पहली बार
मेरे घर आई...

सच ! बच्चे होते ही हैं इतने प्यारे कि हमारी ज़िंदगी बन जाते हैं... उनकी एक मुस्कराहट पर दोंनों जहां की खु़शियां लुटा देने को जी चाहता है... परी हमेशा खु़श रहे... आमीन...

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मिराती से राष्ट्रपति भवन तक की गाथा


फ़िरदौस ख़ान
महापुरुषों की ज़िंदगी एक रौशन चिराग़ की तरह होती है, जो दूसरों को रास्ता दिखाने का काम करता है. तभी तो हमारे देश में बचपन से ही बच्चों को महापुरुषों की कहानियां सुनाने की प्रथा रही है. लोककथाओं में भी महापुरुषों के अनेक क़िस्से होते हैं. इन क़िस्सों के ज़रिये नानी-दादी या घर की अन्य बुज़ुर्ग महिलाएं बच्चों को महानता का सबक़ पढ़ाती आई हैं. अमूमन सभी सभ्ताओं के बच्चे अपने देश के महापुरुषों की जीवनियां बचपन में ही सुन लेते हैं. अगर वे इनसे सीख हासिल करते हैं, तो ही जीवनियां उनकी ज़िंदगी को बेहतरीन बनाने का काम करती हैं. प्रकाशक भी इन जीवनियों के महत्व को समझते हैं, तभी तो किसी भी व्यक्ति के किसी महान ओहदे तक पहुंचने या महानता का कार्य करने पर वे उसकी जीवनी को प्रकाशित करके जनमानस तक पहुंचाने में लग जाते हैं. इसी परंपरा को क़ायम रखते हुए डायमंड बुक्स ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ज़िंदगी पर आधारित एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी. हालांकि प्रणब दा को अपने पदनाम से पहले महामहिम शब्द जोड़ना पसंद नहीं है. इसलिए राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने औपनिवेशिक काल के हिज़ एक्सीलेन्सी यानी महामहिम जैसे आदरसूचक शब्दों के इस्तेमाल वाले प्रोटोकॉल में बदलाव करते हुए नए प्रोटोकॉल को औपचारिक मंज़ूरी दी. इसके तहत अब राष्ट्रपति महोदय शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा. उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए माननीय शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा और उनके नाम से पहले श्री या श्रीमती लगाने की हिंदुस्तानी परंपरा को अपनाया जाना चाहिए. राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कहा था उम्मीदों से ज़्यादा बड़ी है मेरी जीत. जिन लोगों ने पिछले पांच दशकों के दौरान मेरा साथ दिया, उन सभी का शुक्रिया. देश की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा. अलबत्ता इसकी शुरुआत उन्होंने औपनिवेशिक काल के प्रोटोकॉल को बदलने के साथ कर दी है.

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर, 1935 को बंगाल के वीरभूम ज़िले के गांव मिराती में हुआ. उनके पिता काम द किंकर मुखर्जी स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्होंने देश की आज़ादी के आंदोलन में हिस्सा लिया और उन्हें दस साल जेल में बिताने पड़े. बाद में वह विधाक बने. प्रणब मुखर्जी को भी देशसेवा के गुण अपने पिता से विरासत में मिले. वह 13 जुलाई, 1957 को सुभम मुखर्जी के साथ प्रणय सूत्र में बंधे. उनके दो बेटे और एक बेटी है. उनके बड़े बेटे अभिजीत मुखर्जी कांग्रेस विधायक हैं. बेटी शर्मिष्ठा कत्थक नृत्यांगना है. प्रणब मुखर्जी ने इतिहास और राजनीति में एमए की डिग्री हासिल की. उन्होंने एलएलबी भी की. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अध्यापन और पत्रकारिता से की थी. इसके बाद वह सियासत में आ गए. वह 1969 में राज्यसभा  के सांसद बने और अपने कार्यों की बदौलत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करते रहे. इंदिरा गांधी ने 1973 में उन्हें अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया. वह फ़रवरी 1973 से अक्टूबर 1974 तक केंद्र में उप मंत्री रहे. फिर वह अक्टूबर 1974 से दिसंबर 1975 तक वित्त राज्यमंत्री बनाए गए. इसके बाद दिसंबर 1975 से मार्च 1977 तक वह राजस्व और बैंकिंग मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे. 1978 में उन्हें कांग्रेस की सर्वोच्च कार्यकारी समिति सीडब्ल्यू में ले लिया  गया. उनके कार्यों को देखते हुए इसी साल उन्हें कांग्रेस का कोषाध्यक्ष बना दिया गया. फिर 1980 में उन्हें राज्यसभा में सदन का नेता बना दिया, जिससे उनके सियासी करियर को फ़ायदा हुआ. जनवरी 1980 से जनवरी 1982 तक वह वाणिज्य मंत्री के तौर पर कार्यरत रहे. फिर जनवरी 1982 में उन्हें वित्तमंत्री के तौर पर नियुक्त किया गया और दिसंबर 1984 तक वह इस पद पर बने रहे. उस वक़्त बनाई गई उनकी नीतियां बहुत सराही गईं.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी के बीच दूरियां बढ़ने लगी थीं. जब कांग्रेस ने अपना नेता चुनकर प्रधानमंत्री बनाने के लिए पार्टी की बैठक बुलाई तो अन्य पार्टी नेताओं के साथ प्रणब मुखर्जी ने भी राजीव गांधी को पार्टी का नेता चुना. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बन गए. बाद में राजीव गांधी ने लोकसभा भंग करवाकर चुनाव करवा दिए. इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर का फ़ायदा कांग्रेस को हुआ और पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई. राजीव गांधी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन उन्होंने प्रणब मुखर्जी को अपने मंत्रि मंडल में  जगह नहीं दी. उनके बीच तल्खी बढ़ती गई. हालत यह हो गई थी कि 1986 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस नाम से एक सियासी दल की स्थापना की. यह कांग्रेस के प्रति उनका प्रेम ही था कि उन्होंने अपनी पार्टी के नाम में कांग्रेस शब्द को शामिल किया. उन्होंने अपनी पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए दिन-रात एक कर दिए, लेकिन उन्हें कामयाबी  नहीं मिल सकी. कुछ वक़्त बाद 1988 में राजीव गांधी के कहने पर वह फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए और अपनी पार्टी का भी कांग्रेस में विलय कर लिया. इस दौरान वह राज्यसभा में बने रहे यानी 1975, 1981, 1993 और 1999 में वह राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए. 1993 में जब वह राज्यसभा के सदस्य थे, तब कांग्रेस मंत्रिमंडल में उन्हें केंद्रीय मंत्री बना दिया गया. वह जनवरी 1993 से फ़रवरी 1995 तक वाणिज्य मंत्री रहे. इसी साल उन्हें विदेश मंत्रालय में ले लिया गया. वह फ़रवरी 1995 से मई 1996 तक विदेश मंत्री रहे.

उन्होंने 2004 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. वह लोकसभा में सदन के नेता बना दिए गए. वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री बने. 2006 में उन्हें रक्षा मंत्रालय से हटाकर विदेश मंत्री बना दिया गया और मई 2009 तक वह अपने पद पर बने रहे. लेकिन विदेश मंत्रालय के काम में उनकी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जांगीपुर संसदी क्षेत्र से चुनाव जीता. उन्हें फिर से वित्त मंत्रालय का दायित्व संभालने का मौक़ा मिला. वह जून 2012 तक वित्तमंत्री रहे. प्रणब मुखर्जी ऐसे पहले वित्तमंत्री माने जाते हैं, जिन्होंने पहली बार अंतरिम बजट पेश किया. इससे पहले लोकसभा में किसी भी वित्तमंत्री ने अंतरिम बजट पेश नहीं किया था. उन्होंने 2009 में चुनाव से पहले अंतरिम बजट पेश करके नई परंपरा का आग़ाज़ किया, जो उस वक़्त की ज़रूरत थी. चुनाव हुए, कांग्रेस की सरकार बनी और नई सरकार का पहला बजट भी प्रणब मुखर्जी ने ही पेश किया. इसके अलावा वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा अफ्रीकी विकास बैंक के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के सदस्य भी रह चुके हैं. यहां भी उन्होंने अपनी क़ाबिलियत का लोहा मनवाया. विभिन्न मंत्रालयों में रहते हुए उन्होंने कई सराहनीय काम किए. उन्होंने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री रहते हुए विश्व व्यापार संगठन की सफ़ल स्थापना में विशेष योगदान दिया, जिसे वाणिज्य मंत्रालय की उपलब्धि माना गया. बतौर विदेश मंत्री उन्होंने अमेरिका के साथ असैनिक परमाणु क़रार कराने और संबंधों को सुधारने में अहम किरदार निभाया. उन्हें सरकार का संकट मोचक भी माना जाता रहा है. जब कभी भी सरकार पर संकट के बादल मंडराये, उन्होंने अपनी सूझबूझ से सरकार को उस परेशानी से उबारा. कांग्रेस ने 13 जून, 2012 को प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया. उन्होंने 22 जुलाई, 2012 को हुए चुनाव में जीत हासिल की और फिर 25 जुलाई को वह भारत के तेरहवें राष्ट्रपति बन गए. \

वह चार दशक से भी ज़्यादा वक़्त तक सक्रिय राजनीति में रहे. अपने छोटे से गांव मिराती से लेकर राष्ट्रपति भवन तक के उनके सफ़र में कई यादगार लम्हे आए. 1984 में उन्हें दुनिया भर के पांच वित्त मंत्रियों  की फ़ेहरिस्त में शामिल किया गया. 1997 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से नवाज़ा गया. 2008 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. पुस्तक के संपादक सुदर्शन भाटिया ने इस किताब में प्रणब दा से जुड़ी  कई अहम जानकारियां भी दी हैं, जैसे वह दुर्गा के भक्त हैं और नवरात्र में तीन दिन पुरोहित बनकर देवी की पूजा करते रहे हैं. वह तक़रीबन 18 घंटे काम करते हैं. इतनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वह डायरी लिखना नहीं भूलते. एक साक्षात्कार में न्होंने कहा था कि वह कभी छुट्टियां नहीं मनाते. वह चीनी नेता डेंग जिओपिन से प्रभावित हैं और उनके आदर्शों को ज़िंदगी में ढालने की कोशिश करते हैं. लेकिन क़द छोटा होने का उन्हें अफ़सोस रहा है. उनका क़द पांच फ़ुट एक इंच है, जो उन्हें कम लगता है. उन्हें फ़ुटबॉल पसंद है और कभी उन्होंने अपने पिता के नाम पर मुर्शिदाबाद में कामद किंकर गोल्ड कप टूर्नामेंट शुरू किया था. उन्हें संगीत सुनने और किताबें पढ़ने का बहुत शौक़ है. अपनी गाड़ी में वह रवीन्द्र संगीत सुनना पसंद करते हैं. इस किताब में प्रणब मुखर्जी से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी रौशनी डाली गई है यानी राष्ट्रपति पद की दौ़ड़ में उनसे हारने वाले पीए संगमा के आरोपों और आपत्तियों को भी इसमें शामिल किया गया है. इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की किताब टर्निंग प्वाइंट ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज में कांग्रेस एवं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद ठुकराए जाने के वाक़िये का भी ज़िक्र किया गया है. किताब के आख़िरी हिस्से में प्रणब मुखर्जी के सितारों की भी बातें हैं कि किस तरह उनकी कुंडली के मज़बूत ग्रहों ने उन्हें इस देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई.

बहरहाल, इस किताब के ज़रिये पाठक अपने राष्ट्रपति की ज़िंदगी के कई पहलुओं से वाक़ि़फ़ हो जाएंगे. किताब की शैली रोचक है, जिससे पाठकों को इसे पढ़ते हुए अच्छा ही लगेगा.  (स्टार न्यू़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी 
लेखक : सुदर्शन भाटिया 
प्रकाशक : डायमंड बुक्स
क़ीमत : 125 रुपये 

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वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद...


हमने वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद किया है. वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. इसकी रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे हिन्दी में अनुवाद किया था. भाजपा नेता आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया था. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है.

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ
ਤੂੰ ਭਰੀ ਹੈ ਮਿੱਠੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਫਲ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਸੁਹਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਦੱਖਣ ਦੀਆਂ ਸਰਦ ਹਵਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਫ਼ਸਲਾਂ ਦੀਆਂ ਸੋਹਣੀਆਂ ਫ਼ਿਜ਼ਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…

ਤੇਰੀਆਂ ਰਾਤਾਂ ਚਾਨਣ ਭਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰੀ ਰੌਣਕ ਪੈਲ਼ੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਭਿੱਜਿਆ ਹਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਬੋਲੀ ਜਿਵੇਂ ਪਤਾਸ਼ਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਗੋਦ 'ਚ ਮੇਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੇ ਪੈਰੀਂ ਸੁਰਗ ਦਾ ਵਾਸਾ ਹੈ
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…
-ਫ਼ਿਰਦੌਸ ਖ਼ਾਨ  

मातरम का पंजाबी अनुवाद (देवनागरी में)
मां तैनूं सलाम…
तू भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है
तेरी गोद ’च मेरा दिलासा है
तरी पैरीं सुरग दा वासा है
मां तैनूं सलाम…
-फ़िरदौस ख़ान

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद (रोमन में)
Ma tainu salam
Tu bhri hain mithe pani naal
Phal phulaan di mahik suhaani naal
Dakhan dian sard hawawaan naal
Faslan dian sonia fizawan naal
Ma tainu salam...

Tarian raatan chanan bharian ne
Teri raunak faslan harian ne
Tera pyaar bhijia hasa hai
Teri boli jiven patasha hai
Teri god 'ch mera dilaasa hai
Tere pairin surg da vasa hai
Ma tainu salam...
-Firdaus Khan
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तुम्हारा नाम


मेरे महबूब
कुछ नाम ऐसे होते हैं 
जिनसे 
इश्क़ हो जाता है

जो 
कभी मेहंदी से
हथेली पर महकते हैं
तो कभी 
किसी सफ़ेद रुमाल के 
कोने पर मुस्कराते हैं

सच
कुछ नाम ऐसे होते हैं 
जिनसे 
इश्क़ हो जाता है
जैसे
तुम्हारा नाम...
-फ़िरदौस ख़ान

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