चांद-सी उज्ज्वल कविताएं


फ़िरदौस ख़ान
मन  की कोमल भावनाओं को शब्दों में पिरोना ही काव्य कहलाता है. कविताएं दो तरह की होती हैं, एक छंदयुक्त और दूसरी मुक्तछंद. दरअसल, छंद कविताओं को प्रभावी बनाते हैं और इन कविताओं को गाया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि मुक्तछंद कविताएं गाई नहीं जा सकती हैं. ऐसा नहीं है कि छंदमुक्त कविताएं प्रभाव नहीं छो़डतीं, क्योंकि अच्छी कविताएं पाठक पर गहरा असर डालती ही हैं. ग़ौरतलब है कि छंदमुक्त कविताएं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की देन हैं. कहा जाता है कि काव्य की दुनिया में एक वक़्त ऐसा आया कि कवि छंद पर ज़्यादा ध्यान देने लगे और कविता पर कम. ऐसे में कविता में छंद तो रहा, लेकिन कविता ग़ायब-सी होने लगी. तब निराला छंदमुक्त कविताओं की शुरुआत करके काव्य जगत में नई क्रांति लेकर आए. हालांकि उस  उनका काफ़ी विरोध भी हुआ, लेकिन उस विरोध का उन पर कोई असर नहीं हुआ. आज भी छंद के पैरोकार छंदछंदमुक्त कविताओं को काव्य मानने से इंकार करते हुए इन्हें गद्य क़रार देते हैं. मगर इस सबके बावजूद छंदमुक्त कविताओं ने एक लंबा सफ़र तय किया है और इनकी लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है. छंदमुक्त कविताओं के आए दिन प्रकाशित हो रहे काव्य संग्रह इनकी जनप्रियता के ही प्रतीक हैं.

हाल में शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने चेतन कश्यप का कविता संग्रह चांद के दर पर दस्तक प्रकाशित किया है. अपने नाम की मानिंद इस कविता संग्रह में शामिल तमाम कविताएं मन को छूने की तासीर रखती हैं. इनमें जहां एक ओर ज़िंदगी की जद्दोजहद है और दुख-सुख की धूप-छांव है, तो वहीं दूसरी ओर वहीं इंद्रधनुषी सपनों को हक़ीक़त में बदलने की ललक भी दिखाई प़डती है. चांद के दर तक पहुंचकर दस्तक देने का जज्बा तो चेतन जैसे कवियों में ही हो सकता है. दरअसल, उनकी कविताएं नए मिज़ाज की ऐसी कविताएं हैं, जिन्हें प़ढकर पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है, क्योंकि इनमें शब्दों का सौंदर्य है, तो अनुभूतियों की गहराई भी है. वह बख़ूबी जानते हैं कि अपनी अनुभूतियों को प्रकट करने के लिए उन्हें किन शब्दों का चयन करना है. यह उनकी ख़ासियत है कि उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपनी भावनाओं को बेहद नफ़ासत के साथ कविताओं में ढाला है. उनकी कविता उदासी को ही देखिए-
आधा अधूरा चांद
कुम्हलाया हुआ
दिखता है 
क़िले की दीवार से सर टिकाए हुए
ये कोई आईना है
जिसमें मेरा अक्स दिखता है
या ये कोई पाती है
कि जिसमें तुम्हारी ख़बर आती है

यह किसी रचनाकार की सबसे बड़ी कामयाबी है कि पाठक उसकी रचना से सीधे जु़डकर उससे रिश्ता क़ायम कर लेता है. उनकी कविताएं गहरी छाप छोड़ती हैं. जैसे-
एक अरसे बाद
दिल ने चाहा
कि दुआ मांगी जाए
आंखें ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो गईं
हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद जुड़ गए
और मन ने कहा-
सभी इसी तरह ख़ुश रहें, यूं ही ख़ुश रहें
सदा, सर्वदा

चेतन कश्यप की रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. बहरहाल, उनकी कविताएं पढ़कर पाठकों को सुकून की अनुभूति होगी. किताब का आवरण बेहद आकर्षक है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : चांद के दर पर दस्तक
कवि : चेतन कश्यप
प्रकाशक : शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स 

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पुस्तक समीक्षा : शिखा की उम्मीदों का सूरज


फ़िरदौस ख़ान
छंदमुक्त कविताओं का भी अपना ही रंग होता है. छंदों से मुक्त शब्द भावों की लहरों में बहते जाते हैं और साथ ही पाठकों को भी अपने साथ बहा ले जाते हैं, एक ऐसे संसार में, जिसकी फ़िज़ा में कविताएं गूंजती हैं. शिखा वार्ष्णेय का कविता संग्रह मन के प्रतिबिम्ब भी कुछ ऐसा ही है, जिसे कानपुर के सुभांजलि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. इस काव्य संग्रह में पचास कविताएं और कुछ क्षणिकाएं संग्रहीत हैं. शिखा छंदमुक्त कविताएं लिखती हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि हर कवि या कवयित्री छंदशास्त्र में पारंगत ही हो. ग़ौरतलब है कि छंदमुक्त कविताएं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की देन हैं. कविताएं दो तरह की होती हैं, एक छंदयुक्त और दूसरी छंदमुक्त. छंदयुक्त कविता में छंद शास्त्र के नियमों का पालन किया जाता है, जबकि छंदमुक्त कविया में छंद शास्त्र का कोई नियम नहीं होता.

बक़ौल कवयित्री उनके लिए कविता कोई विधा नहीं है. उनके लिए कविता ज़िंदगी है, धड़कन है, जो हर दिल में होती है, रग-रग में समाई रहती है. ख़ूबसूरत शब्दों के वे मोती जो दिल की गहराइयों से निकलते हैं, अहसास के धागों में पिरोये जाते हैं और फिर भावों की माला-सी बनकर किसी के गले लग जाते हैं, तो वह कविता है. बेशक, मन की कोमल भावनाओं को शब्दों में पिरोना ही काव्य कहलाता है.
शिखा की कविताओं में ज़िंदगी के कई रंग नज़र आते हैं, जो देश और समाज के विभिन्न तबक़ों के हालात बख़ूबी बयां करते हैं. कविता संग्रह की पहली कविता आख़िर को ही लीजिए, जिसमें एक महिला की अभिलाषाओं और उनके पूरे होने के बाद बचे उसके अकेलेपन को बयां किया गया है.
एक ज्योतिषी ने एक बार कहा था
उसे वह मिलेगा सब
जो भी वह चाहेगी दिल से
उसने मांगा
पिता की सेहत
पति की तरक़्क़ी
बेटे की नौकरी
बेटी का ब्याह
एक अदद छत
अब उसी छत पर अकेली खड़ी
सोचती है वो
क्या मिला उसे
ये पंडित भी कितना झूठ बोलते हैं...

इसी तरह अमृत रस में किसान की हालत और उसकी भावनाओं का सजीव चित्रण किया गया है कि किस तरह फ़सल के साथ उसके सपने जुड़ जाते हैं.
देख लहलहाती फ़सल क सपना
आंखें किसान की भर आई थीं
इस बरस ब्याह देगा बिटिया
वर्षा यह संदेश लाई थी

उनकी कविताओं में जहां विषय पारंपरिक हैं, वहीं शैली आधुनिक है. उन्होंने नानी और मुन्नी कविता के ज़रिये तेज़ी से बदल रही दुनिया के परिवर्तन को पेश किया है. चीख़ते प्रश्न और प्रलय... बाक़ी है, के ज़रिये जहां समाज के नैतिक पतन पर सवाल उठाए हैं, वहीं नारी कविता के ज़रिये महिलाओं के ज़िंदगी पर भी रौशनी डाली गई है. ख़ास बात यह है कि उन्होंने अपनी कविताओं में आज के दौर के बिम्ब-प्रतिबिम्बों का इस्तेमाल किया गया है, जैसे-
काश ज़िंदगी में भी
गूगल जैसे ऑप्शन होते
जो चेहरा देखना गवारा नहीं
उन्हें शो नैवर किया जा सकता
और अनावश्यक तत्वों को ब्लॉक 

यह देखकर ख़ुशी होती है कि आज ब्लॉग लेखन को गंभीरता से लिया जा रहा है और ब्लॉग लेखक अब सिर्फ़ ब्लॉग लेखन तक ही सीमित नहीं हैं, वे इससे इतर भी अपने लेखन से पाठकों को प्रभावित कर रहे हैं. शिखा की रचनाएं भी उनके ब्लॉग स्पंदन और पत्र- पत्रिकाओं से होते हुए आज दो-दो किताबों के रूप में सबके सामने हैं. स्वतंत्र लेखन से जुड़ी शिखा की यह दूसरी किताब है. इससे पहले उनकी एक किताब स्मृतियों में रूस (यात्रा संस्मरण) प्रकाशित हो चुकी है. फ़िलहाल वह कथा लेखन में भी हाथ आज़मा रही हैं. बहरहाल, उनकी यह किताब भी पाठकों को पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


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इंटरनेट पर किताबों की दुनिया


फ़िरदौस ख़ान
किताबें हमें अंधेरे से रोशनी की तरफ़ ले जाती हैं. किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं, क्योंकि अच्छे दोस्त न होने पर किताबें ही हमारी सबसे अच्छा साथी साबित होती हैं. किताबें कितना सुकून देती हैं, यह कोई किसी पुस्तक प्रेमी से पूछे. यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि किताबें उस पारसमणि की तरह होती हैं, जिसकी छुअन से अज्ञानी भी ज्ञानी बन जाता है. बाल गंगाधर ने कहा था, अच्छी किताबों के साथ मैं नर्क में रहने के प्रस्ताव का भी स्वागत करूंगा. मानव की ज्ञान पिपासा का बेहतरीन साधन किताबें ही हैं. अब अंतरजाल यानी इंटरनेट के ज़रिये ऑनलाइन किताबें पढ़ी जा सकती हैं. ऐसी अनेक वेबसाइट्‌स हैं, जहां पर यह सुविधा दी गई है. ई-किताब यानी इलेक्ट्रॉनिक किताब, जिसका मतलब है डिजिटल रूप में किताब. ई-किताबें काग़ज़ की बजाय डिजिटल संचिका के रूप में होती हैं, जिन्हें कंप्यूटर, मोबाइल और इसी तरह के अन्य डिजिटल यंत्रों पर पढ़ा जा सकता है. इन्हें इंटरनेट पर प्रकाशित भी किया जा सकता है. साथ ही इसका प्रचार-प्रसार भी आसानी से किया जा सकता है. ये किताबें कई फाइल फॉर्मेट में होती हैं, लेकिन पीडीएफ यानी पोर्टेबल डॉक्यूमेंट फॉर्मेट सर्वाधिक प्रचलित फॉर्मेट है.

ग़ौरतलब है कि गूगल ने 6 दिसंबर, 2010 से इलेक्ट्रॉनिक बुक स्टोर की दुनिया में क़दम रखते हुए अमेजन को टक्कर दी थी. 2004 में गूगल बुक्स प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद से गूगल ने सौ देशों से चार सौ भाषाओं में क़रीब डेढ़ करोड़ किताबें डिजिटाइज की हैं. हालांकि लेखकों और प्रकाशकों ने गूगल के किताबें डिजिटाइज करने पर ऐतराज़ जताया था. जिन किताबों का कॉपीराइट है या फिर जिनके लेखकों का कोई पता नहीं है, ऐसी किताबें ई-बुक स्टोर पर नहीं बेची जाएंगी. गूगल पर पढ़ी जा सकने वाली मुफ्त किताबों की वजह से विवाद भी हुआ, लेकिन गूगल का कहना है कि इससे ज़्यादा लोग किताबें पढ़ सकेंगे. हमें विश्वास है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा ई-बुक पुस्तकालय होगा. मुफ्त पढ़ी जा सकने वाली किताबों को मिलाकर इनकी कुल संख्या तीस लाख से ज़्यादा है. मैकमिलन, रैन्डम हाउस, साइमन एंड शूस्टर जैसे मशहूर प्रकाशकों की हज़ारों डिजिटल किताबें ई-बुक स्टोर में बेची जाएंगी. जहां तक क़ीमतों का सवाल है, ई-बुक्स स्टोर की किताबें बाज़ार के हिसाब से होंगी, जबकि कई फ्री किताबें पहले ही गूगल पर मौजूद हैं. एक शोध के मुताबिक़, अकेले अमेरिका में ई-बुक डिवाइस का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 2015 तक 2 करोड़ 94 लाख तक पहुंच जाएगी. फॉरेस्टर सर्वे के मुताबिक़, ई-बुक पढ़ने वाले लोगों में 35 फ़ीसद लोग लैपटॉप पर किताब पढ़ते हैं, 32 फ़ीसद अमेजन के किंडल पर और 15 फ़ीसद लोग एप्पल के आई फ़ोन पर पढ़ते हैं. कई ऐसी वेबसाइट्‌स हैं, जहां जाकर आप अपनी मनपसंद किताब पढ़ने का लुत्फ़ उठा सकते हैं.

www.gutenberg.org
यह वेबसाइट किताबों का ख़ज़ाना है. यहां दुनिया भर की क़रीब 60 भाषाओं में 38 हज़ार किताबें मौजूद हैं, जिन्हें ऑनलाइन प़ढा जा सकता है. यहां इन्हें डाउनलोड करने की भी सुविधा है. यहां कॉपीराइट फ्री किताबें रहती हैं. वेबसाइट इन किताबों का ई संस्करण तैयार कराती है. गुटनबर्ग का लक्ष्य अगले साल तक पुस्तक प्रेमियों को ऑनलाइन एक लाख किताबें मुहैया कराना है. हर रोज़ दो लाख यूजर इसका इस्तेमाल करते हैं. गुटनबर्ग एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है, जिसके तहत लोग अपनी मर्ज़ी से वेबसाइट को किताबें दान करते हैं. यहां किताब तलाशना बेहद आसान है.

Books.google.co.in
यहां भी किताबें ही किताबें हैं. यहां पर किसी भी लेखक का नाम या किताब का नाम सर्च करके अपनी मनपसंद किताब तक आसानी से पहुंचा जा सकता है. यहां भी गीत, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास सहित विभिन्न विषयों पर आधारित किताबें मौजूद हैं. किसी की आत्मकथा पढ़नी हो, किसी की जीवनी पढ़नी हो या कोई और रचना, सब कुछ यहां एक क्लिक की दूरी पर उपलब्ध है.

www.bartleby.com
यह वेबसाइट भी बहुत पसंद की जाती है. इस वेबसाइट पर इनसाइक्लोपीडिया, रिफ्रेंस बुक, शब्दकोष भी हैं. साहित्य और पत्रकारिता के छात्र इसे खूब पसंद करते हैं. कुल मिलाकर यह वेबसाइट छात्रों, विशेषकर शोध के छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है.

Onlinebooks.library.upenn.edu
इस वेबसाइट पर भी सैकड़ों किताबें मौजूद हैं. यहां आप अपनी मनपसंद किताबें पढ़ सकते हैं. यहां भी कॉपीराइट फ्री किताबें उपलब्ध हैं. इसके प्रशंसकों की तादाद भी दिनोंदिन बढ़ रही है.

www.free-ebooks.net
यहां नए लेखकों की रचनाएं रहती हैं. यहां आपको विभिन्न विषयों पर रोचक किताबें मिल जाएंगी. यहां विभिन्न विषयों की उपयोगी किताबें हैं. यहां पर अलग-अलग फॉर्मेट में किताबें उपलब्ध हैं. आप अपनी सुविधा के हिसाब से कोई भी फॉर्मेट चुन सकते हैं.

www.easylib.com
यहां भी सैकड़ों किताबें मौजूद हैं. आप किसी भी विषय से संबंधित किताबें यहां देख सकते हैं.

www.amazon.co.uk
यहां भी किताबों का ख़ज़ाना मौजूद है. इस वेबसाइट पर ऑनलाइन किताबें ख़रीदने की सुविधा भी दी गई है. अलबत्ता, आप मनपसंद किताबों को डाउनलोड कर अपनी एक डिजिटल लाइब्रेरी भी बना सकते हैं, ताकि जब चाहें, किताबों को आसानी से पढ़ सकें. ये किताबें दोस्तों और परिचितों को बतौर उपहार भी भेजी जा सकती हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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जीना इसी का नाम है…


फ़िरदौस ख़ान
इंसान के बहुत से सपने होते हैं, ख़्वाहिशें होती हैं, लेकिन जब उसके इंद्रधनुषी सपने और ख़्वाहिशें पूरी नहीं हो पातीं, तो वह दुखी हो जाता है. उसे लगता है कि ज़िंदगी में अब कुछ नहीं बचा, सब कुछ ख़त्म हो चुका है. दरअसल, यहीं से उसके दुखों की शुरुआत होती है. उसे अपनी ज़िंदगी नीरस और बेमक़सद लगने लगती है. लेकिन इंसान अपनी आत्मशक्ति से अपनी ज़िंदगी को ख़ुशहाल बना सकता है. बस, इसके लिए उसे अपना नज़रिया बदलना होगा. अगर वह अहंकार को त्याग कर ख़ुद को पहचान ले, तो वह ताउम्र ख़ुशी से गुज़ार सकता है. हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब आनन्दमय जीवन का उत्सव में लेखक स्वामी राम ने लोगों को जीने की कला से रूबरू कराया है. हिमालय के संत स्वामी राम का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्म के कुछ दिनों बाद ही पिता का साया उनके सिर से उठ गया. उनकी मां की आंखों की रोशनी चली गई. उन्हें एक बंगाली संत ने गोद ले लिया. उनकी परवरिश हिमालय के मठों में ज़रूर हुई, लेकिन शिक्षा पाश्‍चात्य पद्धति से हासिल की. पहले मसूरी के वुड स्टॉक स्कूल में उनका दाख़िला हुआ. इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उन्होंने प़ढाई की. वह अध्यात्म को गहराई से समझना चाहते थे और इसके साथ ही संसार के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा भी उनमें थी. इसलिए उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीपों का सफ़र किया. उन्हें महान लोगों का साथ मिला. उन्होंने महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के साथ शिक्षा हासिल की. क़िस्मत ने उनका ख़ूब साथ दिया और महज़ 24 साल की उम्र में वह शंकराचार्य बन गए, लेकिन तीन साल बाद उन्होंने हिंदू धर्म का यह सर्वोच्च पद छो़ड दिया और शादी कर ली. उनके दो बच्चे हुए, लेकिन गृहस्थ जीवन उन्हें ज़्यादा रास नहीं आया और वह फिर से संन्यासी बन गए.

बारह साल तक अकेले ज़िंदगी बसर करने के बाद उन्होंने हिमालयन इंस्टीट्यूट की स्थापना की. यहां योग, संपूर्ण स्वास्थ्य और अध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी. उन्होंने इंस्टीट्यूट में शिक्षक और प्रशासक दोनों के रूप में काम किया. एक तरफ़ उन्होंने अध्यात्म से ख़ुद को जो़डे रखा, वहीं दूसरी तरफ़ सांसारिक कार्यों को बख़ूबी अंजाम देते रहे. उन्होंने यात्राएं कीं, व्याख्यान दिए और किताबें लिखीं. वह जीवंत, ऊर्जावान और आनंद से भरे हुए थे. वे मानते थे कि मनुष्य का शरीर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघरों से भी ऊंचा है, क्योंकि इस शरीर में निवास करने वाली आत्मा ही देवता है और अपने इसी सिद्धांत का प्रचार करते हुए उन्होंने आनंदमय जीवन जीने की कला लोगों को सिखाई. भौतिक शरीर एवं आध्यात्मिक शरीर दोनों के संतुलन के लिए मन, आत्मा, परमात्मा, पंचतत्व और इंद्रियों का ज्ञान होना ज़रूरी है. जो मनुष्य पंचतत्व शरीर का संतुलन करना सीख जाता है, वह न केवल आनंदमय जीवन जीना सीख जाता है, बल्कि उसे आत्म ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है. लेकिन हैरत की बात तो यह है कि इंसान उस चीज़ की तलाश में यहां-वहां भटकता फिरता है, जबकि वह चीज़ उसके पास ही होती है. वह लिखते हैं-बचपन से ही तुम मठ-मंदिरों और अपने माता-पिता से सुन रहे हो, जिन्होंने तुमसे कहा है कि तुम्हें भगवान को खोजना चाहिए, पर वास्तव में तुम्हारे पास पहले से ही वह है, क्योंकि वह तो हर जगह और हर समय मौजूद है. जो तुम्हारे पास नहीं है, तुम स्वयं में भी पाने में सफल नहीं हो सकते, तो मानव का उद्देश्य और प्रयास भगवान को पाना नहीं होना चाहिए. उसका प्रयास वास्तव में स्वयं को पाना होना चाहिए. जब तुम सही में स्वयं को जानोगे, तब तुम स्वयं को महसूस करोगे और तब तुम समझोगे कि तुमने भगवान को भी महसूस कर लिया है. तुम्हें भगवान बनने या उसे धारण करने की ज़रूरत नहीं है और अगर तुम ऐसा कर पाते हो, तो तुम निराश हो जाओगे कि अगर ऐसा होता है, तो कोई भी तुम्हें समझ नहीं पाएगा. इसके बजाय स़िर्फ एक लक्ष्य के लिए परिश्रम करो. अपने वास्तविक स्व को पहचानने के लिए सीखो अपने अंदर के स्व को कैसे पहचानोगे. अगर तुम स्वयं को नहीं पहचानोगे और तुम भगवान को जानने की कोशिश करोगे, तो ऐसा संभव ही नहीं होगा.

एक दिन स्वामी राम ने अपने शिक्षक से भगवान दिखा देने की ज़िद की. इस पर शिक्षक ने पूछा कि तुम कैसा भगवान देखना चाहोगे, क्योंकि भगवान के बारे में तुम्हारी कोई न कोई धारणा तो होगी ही. उन्होंने कहा कि इस बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं. इस पर उनके शिक्षक ने कहा कि जिस दिन तुम धारणा बना लोगे, उस दिन मैं तुम्हें भगवान दिखा दूंगा. उनका मतलब था कि यह हमारा मस्तिष्क ही है, जिसने भगवान की अवधारणा विकसित की है, पर मस्तिष्क के पास भगवान की पूरी अवधारणा नहीं है, क्योंकि मस्तिष्क की इतनी विस्तृत क्षमता नहीं है. भगवान मानव मस्तिष्क द्वारा पूरी तरह से कभी भी अवधारित नहीं किया जा सकता. हम में से अधिकतर भगवान और गुरुओं की एक सीमित अवधारणा ही विकसित कर पाते हैं और बाद में हम पाते हैं कि दोनों वास्तव में अलग हैं, उससे जो हमने अवधारित किए थे.

दरअसल, इच्छाएं ही दुख का कारण बनती हैं. अगर इच्छाएं ख़त्म कर दी जाएं, तो इंसान हमेशा ख़ुश रह सकता है. एक बार एक पत्रकार ने महात्मा गांधी से पूछा, प्रसन्नता कैसे प्राप्त की जाए. गांधी जी ने उत्तर दिया- जब तुम्हारी कोई इच्छा नहीं होगी, तब तुम प्रसन्न रहोगे. सामान्यतया तुम सोचते हो, जब मैं भगवान को पा लूंगा, तब मैं भी प्रसन्न रहूंगा, पर व्यावहारिक बनकर तुम्हें यह पहचानना होगा, जब तुम्हारी कोई इच्छा नहीं होती, इसका अर्थ है, तुमने सारी इच्छाएं पूरी कर लीं और अब तुम प्रसन्न हो. एक सामान्य आदम और एक साधु में यही अंतर है कि एक साधु अंदर से शक्तिशाली होता है और किसी को आज्ञा नहीं देता कि वह उसके मस्तिष्क और भावनाओं को प्रभावित करे. महात्मा बुद्ध ने इसका प्रदर्शन राजग्रही गांव में किया था, अपना सिंहासन छो़डने के बाद, अपना राज्य त्यागने के बाद और उस छोटे से गांव में चले गए आडंबरहीन जीवन जीने के लिए. दूसरे से सहायता मांगने के कारण अहंकार कम होता है, इसलिए वह वहां चले गए भिक्षा मांगने के लिए. वह राजकुमार थे, पर वह संसार के सबसे साधारण आदमी बनना चाहते थे. बेशक, इंसान चाहे, तो क्या नहीं कर सकता. बक़ौल राम स्वामी, तुम्हारे पास शक्ति है कि तुम अपना भाग्य बदल सकते हो. तुम्हारे पास शक्ति है कि तुम अपना व्यक्तित्व बदल सकते हो. तुम्हारे पास शक्ति है कि तुम अपने पूरे जीवन की धारा बदल सकते हो और उसे एक नई दिशा दे सकते हो. हां, इसके लिए तुम्हें ख़ुद को बदलना प़डेगा, अपने विचारों को बदलना प़डेगा.

आत्मिक शांति के लिए ध्यान बेहद ज़रूरी है. ध्यान की प्रक्रिया किसी विशेष धर्म, संस्कृति या समूह से जु़डा हुआ कर्म-कांड नहीं है. सभी महान धर्म एक समान वास्तविकता से आते हैं और बिना इस वास्तविकता को जाने जीवन का उद्देश्य परिपूर्ण हो ही नहीं सकता. सभी महान और बौद्धिक पुरुष और महिलाएं ध्यान लगाते थे. ईसा मसीह निश्‍चित रूप से ध्यान करते थे. मोज़ेज, राम और कृष्ण भी ध्यान लगाते थे, क्योंकि ध्यान ही मन-मस्तिष्क को शांत करता है. ध्यान वास्तविकता के प्रति जागरूक करता है. ध्यान निर्भय बनाता है. ध्यान न केवल प्रेम करने वाला बनाता है, बल्कि उस आंतरिक आनंद के स्तर पर ले जाता है, जिसे समाधि कहते हैं. बाइबल में कहा गया है कि जिनके पास सुनने के लिए कान हैं वे सुनेंगे. जब मस्तिष्क शांत और लय में होगा, तब वह अनजानी आवाज़ें भी सुन पाएगा और गहरे ध्यान में प्राचीन साधु कुछ निश्‍चित आवाज़ें सुनते थे, जिन्हें मंत्र कहा जाता है और इस स्थिति में जो ध्वनि सुनी जाती है, उसका किसी विशेष भाषा, धर्म या परंपरा से कोई संबंध नहीं होता है.

बहरहाल, यह किताब सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद क्या है और हम हक़ीक़त में क्या पाना चाहते हैं. आज के दौर में जब इंसान दौलत, शोहरत और ताक़त के पीछे भाग रहा है और इन्हें पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है, तो ऐसे में यह किताब इंसान को ख़ुद के अंदर झांकने के लिए प्रेरित करती है. जब से इंसान ने इस धरती पर क़दम रखा है, तभी से वह ईश्वर को पा लेना चाहता है. अलग-अलग मज़हबों में ईश्वर को पाने के लिए रास्ते बताए गए हैं, जिन पर चलकर वह अपने ईश्‍वर को पा सकता है. हैरत की बात है कि इसके बाद भी लोग ख़ुदा को पाने के लिए ख़ुदा को ही भूल गए हैं और ढोंगियों के जाल में फंसते जा रहे हैं. इसकी वजह से धर्म भी एक ब़डा कारोबार बन गया है. आज के ऐसे दौर में यह किताब ख़ुद से परिचय कराने का एक बेहतर साधन है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : आनन्दमय जीवन का उत्सव
लेखक : स्वामी राम
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 150 रुपये

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ताओ तेह चिंग में जीवन का सार


फ़िरदौस ख़ान       
भारत में जो दर्जा ऋग्वेद को हासिल है, चीन में वही मुक़ाम ताओ तेह चिंग का है. इस प्राचीन ग्रंथ को चीनी दर्शन का मूल माना जाता है. चीन के महान दार्शनिक लाओ त्सु की इस कालजयी रचना ने चीनी फ़लस़फे की सभी शाखाओं को प्रभावित किया है, चाहे वह लीगलिज्म हो, निओ कन्फयूशियनिज्म हो या फिर चीनी बुद्धिज्म हो. इस ग्रंथ ने दुनिया भर के प्रगतिशील समाज का ध्यान भी अपनी तरफ़ खींचा है. लाओ त्सु के सूक्त चीन, हांगकांग और ताइवान आदि देशों में इतने ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जितना हमारे देश में वेदमंत्र अहमियत रखते हैं. ताओ तेह चिंग के सूक्त ईसा से भी कई साल पहले से ताओवादियों के दिलों पर राज कर रहे हैं. इनकी ख़ास बात यह है कि ये सूक्त किसी देश या जाति विशेष के लिए नहीं हैं, बल्कि यह समूची मानव जाति के कल्याण के लिए हैं.

हिन्द पॉकेट बुक्स ने हाल में चीन के महान दार्शनिक लाओ त्सु की विचारधारा और उनकी शिक्षाओं पर आधारित एक किताब प्रकाशित की है. महान चीनी दार्शनिक लाओ त्सु नामक यह किताब इस महान दार्शनिक पर लिखी गई अंग्रेजी की एक किताब का अनुवाद है. अनुवादक इला कुमार का कहना है कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वह चीनी ग्रंथ ताओ तेह चिंग का अनुवाद करेंगी, लेकिन यह काम करके उन्हें बेहुद ख़ुशी मिली है.

हिंदुस्तान की तरह ही चीन की सभ्यता भी बहुत पुरानी है. तक़रीबन छह हज़ार बरसों का इसका इतिहास मौजूद है. चीन के इतिहास में लाओ त्सु का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ है. कंफ्यूशियस भी उनके समकालीन थे. हिंदुस्तान के महात्मा बुद्ध, महावीर और यूनान के महान दार्शनिक सुकरात भी उनके आसपास के वक़्त में ही हुए हैं. लाओ त्सु चीन के सरकारी पुस्तकालय में तक़रीबन चार दशक तक ग्रंथपाल रहे. इसी दौरान उन्हें किताबें प़ढने का शौक़ हो गया और वह एक के बाद एक किताबें प़ढते चले गए. किताबों ने उनकी ज़िंदगी में भी इल्म की रौशनी बिखेर दी. अब उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी. पुस्तकालय की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद वह लिंगपो पर्वत पर चले गए और वहां ध्यान चिंतन में लीन हो गए. नतीजतन, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई. ताओ तेह चिंग उनका सुप्रसिद्ध ग्रंथ है. इसके बारे में कहा जाता है कि इसमें वर्णित विचार लाओ त्सु के न होकर अन्य दार्शनिकों के हैं.

ताओ तेह चिंग के बारे में ओशो ने लिखा था-लाओ त्सु ने यह अकेली एक ही किताब लिखी है और यह उसने लिखी ज़िंदगी के आख़िरी हिस्से में. उसने कोई किताब कभी नहीं लिखी. और ज़िंदगी भर लोग उसके पीछे पड़े थे. साधारण से आदमी से लेकर सम्राट तक ने उससे प्रार्थना की थी कि लाओ त्सु, अपने अनुभव को लिख जाओ. लाओ त्सु हंसता और टाल देता. और लाओ त्सु कहता, कौन कब लिख पाया है? मुझे उस नासमझी में मत डालो. पहले भी लोगों ने कोशिश की है. और जो जानते हैं उनकी कोशिश पर हंसते हैं, क्योंकि वे नाकाम हुए हैं. और जो नहीं जानते, वे उनकी नाकामी को सत्य न समझ कर पकड़ लेते हैं. मुझसे यह भूल न करवाएं. जो जानते है, वे मुझ पर हंसेंगे कि देखो, लाओ त्सु भी वहीं कर रहा है. जो नहीं कहा जा सकता, उसे कह रहा है. जो नहीं लिखा जा सकता, उसको लिख रहा है. नहीं, यह मैं नहीं करूंगा. लाओ त्सु ज़िंदगी भर टालता रहा, टालता रहा. मौत क़रीब आने लगी, तो मित्रों का दबाव और शिष्यों का आग्रह भारी पड़ने लगा. लाओ त्सु के पास सच में संपदा तो बहुत थी. बहुत कम लोगों के पास इतनी संपदा होती है. बहुत कम लोगों ने इतना गहरा जाना और देखा है. तो स्वाभाविक था, आसपास के लोगों का आग्रह भी उचित और ठीक ही था. लाओ त्सु लिख जाओ, लिख जाओ. जब आग्रह बहुत बढ़ गया और मौत दिखाई देने लगी आते हुए. और लाओ त्सु मुश्किल में पड़ गया, तो एक रात निकल भागा. निकल भागा, उन लोगों की वजह से, जो पीछे पड़े थे कि लिखो, बोलो, कहो. सुबह शिष्यों ने देखा कि लाओ त्सु की कुटिया ख़ाली है. पक्षी उड़ गया. पिंजड़ा ख़ाली पड़ा है. वे बड़ी मुश्किल में पड़ गए. सम्राट को ख़बर की गई और लाओ त्सु को मुल्क की सरहद पर पकड़ा गया. सम्राट ने अधिकारी भेजे और लाओ त्सु को रुकवाया, चुंगी पर देश की, जहां चीन समाप्त होता था. और लाओ त्सु से कहा कि सम्राट ने कहा है कि चुंगी दिए बिना तुम जा न सकोगे, तो लाओ त्सु ने कहा कि मैं तो कुछ भी साथ नहीं लिए जा रहा हूं, जिससे मुझे चुंगी देनी पड़े. सम्राट ने कहलवा भेजा कि तुमसे ज़्यादा संपत्ति इस मुल्क के बाहर कभी कोई आदमी लेकर नहीं भागा. रुको, चुंगी नाके पर और जो भी तुमने जाना है, लिख जाओ.

ताओवाद चीन के प्रमुख धर्मों में शामिल है. ताओ तेह चिंग की रचनाओं में जीवन का सार है. बानगी देखिए-
स्वयं पर विजय
दूसरों को ताक़त द्वारा जीता जा सकता है
लेकिन स्वयं पर विजय पाना असंभव जैसा है
प्राप्य में संतुष्टि पाना धनवान की निशानी है
हिंसा द्वारा भी लक्ष्य प्राप्ति शायद संभव है
लेकिन जो अडिग है, वही सह सकता है
मृत्यु के कारण कोई खो नहीं जाता
बल्कि वह है एक क़िस्म का दीर्घ अमर्त्यता
ताओ की गति
वापसी ताओ की गति है
समर्पित होना ताओ का रास्ता है
हज़ारों लाखों वस्तुएं चैतन्यता से जन्मती हैं
चैतन्यता अवचेतन के द्वारा स्वरूप पाता है

बहरहाल, यह किताब लाओ त्सु के दर्शन को समझने का बेहतर साधन है. हिन्द पॉकेट बुक्स की किताबों की यह भी एक ख़ासियत है कि इसकी क़ीमत पाठकों की पहुंच के भीतर ही रहती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : लाओ त्सु   
प्रस्तुति : इला कुमार
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स 
क़ीमत : 95 रुपये

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ज़िंदगी बदल सकते हैं विचार


फ़िरदौस ख़ान
इंसान अपनी ज़िंदगी में क्या चाहता है, शायद वह ख़ुद भी नहीं जानता. ग़रीब दौलत चाहता है और अमीर सुकून के कुछ लम्हे. वह ख़ाली हाथ आता है और ख़ाली हाथ ही इस दुनिया से रुख्सत हो जाता है. वह कहां से आता है और कहां चला जा है, अमूमन दुनिया के सभी मज़हबों में इसका ज़िक्र किया गया है. फिर भी इंसान अपने हिसाब से कायनात के रहस्यों को जानने की कोशिश करता है. वह जानना चाहता है कि ज़िंदगी का लक्ष्य क्या है और ईश्वर ने उसे इस दुनिया में क्यों भेजा है? इन्हीं सवालों को उठाया गया है विश्व विख्यात लेखक डॉ. वेन डायर की किताब द शिफ्ट में. हिन्द पॉकेट बुक्स ने इस किताब का हिंदी रूपांतरण प्रकाशित किया है, जिसका नाम है लक्ष्य प्राप्ति. किताब में जीवन में लक्ष्य हासिल करने के सीक्रेट बताए गए हैं. किताब अंतरराष्ट्रीय बेस्ट सेलर रही है. अ़खबारों ने भी किताब को सराहा. वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा-डॉ. वेन डायर की लेखनी सीख देती है कि सफलता मात्र एक संयोग नहीं है, यह हमारी सोच, विचार एवं योजना का सार्थक परिणाम है. इसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा-जिज्ञासा से लेकर आत्मज्ञान तक की यात्रा कराने वाली यह विश्व की एक सुंदर पुस्तक है. ट्रिब्यून के मुताबिक़, मनुष्य को ईश्वर का अंश सिद्ध करने एवं ईश्वर में ही लीन होने की कला सिखाने वाली यह पुस्तक अपने आप में अनोखी है. हिलेरी क्लिंटन भी इस किताब के जादू से मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकीं. उनका कहना है कि डॉ. वेन डायर सफलता से आत्मज्ञान का आभास कराने में माहिर हैं. इसी तरह मिशेल ओबामा कहती हैं, यह किताब आत्मोत्कर्ष एवं आंतरिक उन्नति के सरल नियमों का ख़ुलासा  करती है. बक़ौल लेखक, हम सब बिल्कुल महान ताओ या ईश्वर की तरह हैं और हमारे पास चुनाव की आज़ादी भी है. हमारे कुछ चुनाव, जो स्रोत से हमारे संपर्क को जो़डते हैं, वे दूषित और जर्जर हो गए हैं. उनमें से एक चुनाव यह मानता है कि हमारे भौतिक स्व से ईश्वर को प्रकट करना ही अंतिम बिंदु है. यह इस उपहार को प्रकट करने का अवसर नहीं है. इस प्रकार, हम ईश्वर को अपने से परे धकेल देते हैं और अहं पर आधारित जीवन जीने लगते हैं. इस दार्शनिक यात्रा में सीखने वाला सबक़ यही है कि हमें एक आध्यात्मिक जीवन के रूप में अपने अस्तित्व को पहचानना है, जो कि शाश्वत है और जन्म एवं मृत्यु दोनों से ही परे है. भौतिक आकार में मनुष्य की यात्रा ख़त्म होते ही वह फिर से अपने स्रोत से जा मिलता है. हम उस यात्रा में हैं, जिसके लिए लाओत्से ने ताओ ते चिंग के एक पद में कहा है- वापस लौटना ताओ की ही गति है. टीएस इलियट ने लिटिल गिडिंग में कुछ ऐसा ही कहा है- 
हमें अपनी तलाश नहीं रोकनी चाहिए
और हमारी हर तलाश के अंत में
हम वहीं पहुंचेंगे, जहां से हम चले थे
और उस स्थान को पहली बार जानेंगे   

इससे पहले कि हम इस भौतिक शरीर को त्यागें और वापसी की इस यात्रा को पूरा करें, हम अपने स्रोत के जैसा होने की कल्पना करते हैं, उसके ही जैसा बनने का प्रयत्न करने हुए अपने मूल स्वभाव को समझने की कोशिश शुरू कर सकते हैं. हमें किसी न किसी रूप में अपने उस स्रोत को कल्पना की दृष्टि से स्पष्ट रूप में देखना एवं सीखना होगा, जानना होगा कि वह कैसे सोचता है, महसूस करता है या फिर व्यवहार करता है. अपने स्रोत के बारे में यह जानने पर ही हम अपने असली रूप को जान सकेंगे. मैं कहां से आया? इस उत्तर को जानने में यह भी शामिल है कि हम बाक़ी सभी बातों से परे जाकर एक ऐसे नज़रिये के साथ जीने लगें, जो कि हमारे मूल स्वभाव से मेल खाता हो. हमें निश्चित रूप से अपने स्रोत की आध्यात्मिक प्रकृति जैसा बनना चाहिए. उस दिव्य चेतना के भाव को पहचान कर, जो कि हमारा भौतिक स्व ही है, बदले में हम यह चुनाव कर पाते हैं कि उस दिव्य आत्मा को कैसे प्रकट किया जाए? आध्यात्मिक अंश से ही उपजने के बावजूद हमारा भौतिक जगत बहुत अधिक आध्यात्मिक नहीं जान पड़ता. हेनरी वड्सवर्थ लांगफैलो ने अपनी कविता जीवन का संगीत में इसी दुविधा का ज़िक्र किया है-
जीवन यथार्थ है, जीवन सच्चाई है
और क़ब्र ही उसका लक्ष्य नहीं है
ऐ धूल, तुझे धूल में ही आ मिलना है
आत्मा से यह नहीं कहा गया था

यदि आत्मा ही हमारा सच्चा सार है और हम यह विश्वास रखते हैं कि हम वहीं से आए हैं, तब तो मुझे लगता है कि स्वयं को अपने इस प्रामाणिक अंश से जोड़ पाना इतना मुश्किल नहीं होगा. दरअसल, इस काम को करने का एक तरीक़ा यह भी हो सकता है कि हमारी कल्पना में हमारा रचनात्मक स्रोत कोई आकार लेने के बाद जिस तरह सोचता है और कार्य करता है, हम ख़ुद भी अपने विचारों एवं कर्मों को उसी दिशा में मोड़ लें. हमें ख़ुद को काफ़ी तक वैसा ही बनाना है, जैसे कि हमारी आत्मा है. चूंकि हम वहीं से आए हैं, भले ही हमने वर्षों से इसे अनदेखा किया हो, लेकिन यह दिव्यता ही हमारा भाग्य है. ताओ या महान ईश्वर, जिसके हम सभी एक अंश हैं, वह बड़ी व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा है कि हम भी उसके जैसे बन जाएं. मैं कल्पना करता हूं कि यदि सब कुछ रचने वाली आत्मा को सचमुच हमें पाने की चाह है, तो हमें ख़ुद ही इसका एहसास करा देगी. ज़िंदगी में सुकून की बहुत अहमियत है. कहावत भी है कि जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान. शेक्सपियर ने भी कहा है- 
मेरा मुकुट तो मेरे हृदय में है, मेरे सिर पर नहीं
यह हीरों और भारतीय जवाहरातों से नहीं जड़ा
न ही दिखता है, मेरा मुकुट संतोष कहलाता है
ऐसा एक मुकुट, जिसका आनंद कोई राजा ही ले पाता है

 अपनी इस किताब में वह सेवा को महत्व देते हुए मदर टेरेसा को अपना आदर्श बताते हैं, जिन्होंने अपनी सारी उम्र सेवा कार्य में गुज़ार दी. उन्होंने कहा था-प्यार अपने आप में अकेला हो ही नहीं सकता. तब इसका कोई मक़सद ही नहीं रह जाता है. प्यार का असली ज्ञान तभी होगा, जब आप इसे सेवा से जोड़ेंगे. इसी तरह जाने माने सूफ़ी कवि रूमी ने कहा था-अगर तुम पूरे दिन में प्रार्थना का एक ही शब्द मुंह से निकालते हो, तो वह शुक्रिया ही होना चाहिए. बेशक, यह किताब इंसान को आत्मविश्लेषण के लिए प्रेरित करते हुए उसे आत्मज्ञान का महान सबक़ पढ़ाती है. आज की भागदौड़ की ज़िंदगी में यह किताब सुकून के बहुत से लम्हे मुहैया कराती है. उम्मीद है कि पाठकों को भी यह किताब बेहद पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : लक्ष्य प्राप्ति
लेखक: डॉ. वेन डायर
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 150 रुपये

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धूप भी चांदनी-सी लगती है...


फ़िरदौस ख़ान
आधुनिक उर्दू शायरी के क्रांतिकारी शायर अली सरदार जाफ़री ने अपनी क़लम के ज़रिये समाज को बदलने की कोशिश की. उनका कहना था कि शायर न तो कुल्हा़ड़ीकी की तरह पेड़ काट सकता है और न इंसानी हाथों की तरह मिट्‌टी से प्याले बना सकता है. वह पत्थर से बुत नहीं तराशता, बल्कि जज़्बात और अहसासात की नई-नई तस्वीरें बनाता है. उनके पास विचार थे, जज़्बा था और क़लम थी, जिसके ज़रिये उन्होंने ताउम्र समाज को बेदार करने की कोशिश की. अली सरदार जाफ़री का जन्म 29 नवंबर, 1913 को उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के बलरामपुर में हुआ था. घर का माहौल ख़ालिस मज़हबी था. ऐसे घरों में अनीस के मर्सियों को वही जगह हासिल है, जो हिंदू परिवारों में रामायण की चौपाइयों को प्राप्त है. अली सरदार जाफ़री पर इस माहौल का गहरा असर पड़ा और वह 17 साल की उम्र से ही मर्सिया कहने लगे. यह सिलसिला 1933 तक बदस्तूर जारी रहा. उनका उन दिनों का एक शेअर बहुत मशहूर हुआ था.

अर्श तक ओस के क़तरों की चमक जाने लगी
चली ठंडी जो हवा तारों को नींद आने लगी

बलरामपुर में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके 1933 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया. यहां उन्हें अख्तर हुसैन रायपुरी, सिब्ते-हसन, जज़्बी, मजाज़, जां निसार अख्तर और ख्वाजा अब्बास जैसे साथी मिले. इसी दौरान वह कम्युनिस्ट विचारधारा के क़रीब आए और छात्र आंदोलनों में बढ़-चढ़कर शिरकत करने लगे. हड़ताल की वजह से ही 1936 में उन्हें विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया. यह माहौल का ही असर रहा कि उनका रु़ख मर्सिया से हटकर सियासी नज़्मों की तरफ़ हो गया. उन्होंने दिल्ली के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से बीए की डिग्री ली. इसके बाद वह लखनऊ आ गए. लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद वह मुंबई पहुंच गए. यहां वह कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए और आंदोलनों की वजह से कई बार जेल गए.

उन्होंने कथा लेखन भी किया. उनका लघु कथाओं का पहला संग्रह मंज़िल 1938 में प्रकाशित हुआ. शुरू में वह हाजिन के नाम से लिखा करते थे. वह नया अदब नाम की साहित्यिक पत्रिका के सह संपादक भी रहे. उनकी शायरी का पहला संग्रह परवाज़ 1944 में प्रकाशित हुआ. इसके बाद उनके कई संग्रह आए, जिनमें जम्हूर (1946), नई दुनिया को सलाम (1947), ख़ून की लकीर (1949), अम्मन का सितारा (1950), एशिया जाग उठा (1950), पत्थर की दीवार (1953), एक ख्वाब और (1965) पैरहने-शरर (1966), लहू पुकारता है (1978) और मेरा सफ़र (1999) है. उन्होंने फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे. इनमें फ़िल्म ज़लज़ला, धरती के लाल (1946) और परदेसी (1957) शामिल हैं. उन्होंने कबीर, मीर और ग़ालिब के काव्य संग्रहों का संपादन भी किया. उन्होंने इप्टा के लिए दो नाटक भी लिखे. उन्होंने दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनाईं. उन्होंने उर्दू के सात मशहूर शायरों की ज़िंदगी पर आधारित कहकशां नामक धारावाहिक का निर्माण भी किया. उन्हें 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. फ़िराक़ गोरखपुरी और कुर्तुल एन हैदर के साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले उर्दू के वह तीसरे साहित्यकार हैं. उन्हें 1967 में पद्मश्री से नवाज़ा गया. उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार का उर्दू अकादमी पुरस्कार और मध्य प्रदेश सरकार का इक़बाल सम्मान भी मिला. उनकी कई रचनाओं का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. वह प्रगतिशील लेखक आंदोलन के अलावा कई अन्य सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे. प्रगतिशील उर्दू लेखकों का सम्मेलन आयोजित करने को लेकर उन्हें 1949 में भिवंडी में गिरफ्तार कर लिया गया. तीन महीने बाद ही उन्हें एक बार फिर गिरफ्तार किया गया. उन्होंने जेल में भी लिखना जारी रखा. उनकी नज़्म जेल की रात में उनके जेल में बिताए लम्हों की कैफ़ियत झलकती है.

पहाड़ सी रात
उदास तारे, थके मुसाफ़िर
घना अंधेरा, स्याह जंगल
जहां सलाखें उगी हुई हैं
अज़ीयतों के पुराने इफ़रीत क़ैदियों को निग़ल रहे हैं
ख़ामोशी सहमी हुई खड़ी है
स्याही अपने स्याह दांतों से रौशनी को चबा रही है
उचाट नींदों के नाग आंखों को डस रहे हैं
मैं छिद रहा हूं हज़ारों कांटों से अपनी बेचैन करवटों में
ये रात भी कल की रात की तरह अपनी सफ्फाकियों को लेकर
उफ़क़ के उस पार जा छुपेगी
मगर मुझे डस नहीं सकेगी
मेरी निगाहों में मेरी महबूब तेरी सूरत रची हुई है
ये चांद मेरी हसीन यादों के आस्मां पर खिला हुआ है
तेरे तसव्वुर से मेरे सीने में चांदनी है

उनकी रूमानी नज़्मों में भी वही संघर्षशीलता का जज़्बा रचा बसा है, जो उनकी सियासी और क्रांतिकारी नज़्मों में नज़र आता है-
मैं तुझको भूल गया इसका एतबार न कर
मगर ख़ुदा के लिए मेरा इंतज़ार न कर
अजब घड़ी है मैं इस वक़्त आ नहीं आ सकता
सरूरे इश्क़ की दुनिया बसा नहीं सकता
मैं तेरे साज़े-मुहब्बत पे गा नहीं सकता
मैं तेरे प्यार के क़ाबिल नहीं प्यार न कर
न कर ख़ुदा के लिए मेरा इंतज़ार न कर

उनकी नज़्म तू मुझे इस प्यार से न देख में जाड़ो की सुबह की गुनगुनी धूप का अहसास मिलता है-
तू मुझे इतने प्यार से मत देख
तेरी पलकों के नर्म साये में
धूप भी चांदनी सी लगती है
और मुझे कितनी दूर जाना है
रेत है गर्म, पांव के छाले
यूं दमकते हैं जैसे अंगारे
प्यार की ये नज़र रहे, न रहे
कौन दश्त-ए-वफ़ा में जाता है
तेरे दिल को ख़बर रहे न रहे
तू मुझे इतने प्यार से मत देख

उनकी शायरी में निराशा में आशा और अविश्वास में विश्वास के दिए जगमगाते नज़र आते हैं. उनकी शायरी उमंगें पैदा करती है. बानगी देखिए-

सिर्फ़ इक मिटती हुई दुनिया का नज़ारा न कर
आलमे-तख्लीक़ में है इक जहां ये भी तो देख
मैंने माना मरहले हैं सख्त राहें हैं दराज़
मिल गया है अपनी मंज़िल का निशां ये भी तो देख

उन्होंने मज़दूरों की बदहाली और उनकी परेशानियों, उदासियों को भी अपनी नज़्मों में मार्मिक रूप से पेश किया है. उनकी ऐसी ही एक नज़्म मां है रेशम के कारख़ाने में है-

मां है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है
जब यहां से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा
हाथ सोने कु फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियां होंगी बैंक की रौशन
ख़ून इसका दिए जलाएगा
यह जो नन्हा है भोला-भाला है
ख़ूनी सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है

अली सरदार जाफ़री का एक अगस्त, 2000 को देहांत हो गया. वह कहा करते थे कि हर शायर की शायरी वक़्ती होती है. हो सकता है कि कोई इस बात से सहमत हो और कोई न भी हो, लेकिन यह सच है कि अहसास की शिद्दत हमेशा क़ायम रहती है. इसलिए शायरी की दुनिया में वह हमेशा ज़िंदा रहेंगे. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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खु़दकशी की ख़बर...


ख़ुदकशी की एक ख़बर पढ़कर...
कोई यूं ही तो मौत को गले नहीं लगा लेता... कितनी अज़ीयत झेली होगी उसने, जो उसे अपनी ज़िन्दगी से मौत भली लगी...

जब कभी
अख़बार में पढ़ती हूं
खु़दकशी की कोई ख़बर
तो
अकसर यह
सोचने लगती हूं
क्या कभी ऐसा होगा
मरने वाले अमुक की जगह
मेरा नाम लिखा होगा
और
मौत की वजह नामालूम होगी...
-फ़िरदौस ख़ान
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जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा...


फ़िरदौस ख़ान
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...

जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...

हिंदी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिंदुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी, गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है, ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फिल्म जागृति (1954) के गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की और दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ इंडिया का गीत नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं, बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फिल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं, बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिंदुस्तानी का गीत छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी, आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फिल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.

ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...

राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फिल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...

इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फिल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबा़डी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...

इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तू़फान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फरिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फिल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.

बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा… (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


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बच्चों के लिए एक अच्छी किताब


फ़िरदौस ख़ान
बचपन, उम्र का सबसे प्यारा दौर होता है. यह अलग बात है कि जब हम छोटे होते हैं तो बड़ा होना चाहते हैं, क्योंकि कई बार स्कूल, पढ़ाई और रोकटोक से परेशान हो जाते हैं. हम कहते हैं कि अगर बड़े होते तो हम पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती, न स्कूल ड्रैस पहननी पड़ती और न ही रोज़ सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना पड़ता. मगर जब हम बड़े होते हैं, तो अहसास होता है कि वाक़ई बचपन कितना प्यारा होता है. काश, बचपन वापस मिल सकता. ज़िंदगी में कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जो हमें बचपन की याद दिला जाती हैं. इन्हीं में से एक चीज़ है बाल कविता. ये कविताएं हमें हमेशा याद रहती हैं, बिलकुल हमारे बचपन की खु़शगवार यादों की तरह. कविता लिखना कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह बात बाल मन को समझते हुए कविता लिखने वाला ही समझ सकता है.

हाल में कल्पज़ पब्लिकेशन्स द्वारा बाल कविता संग्रह अस्सी नब्बे पूरे सौ प्रकाशित हुआ है. किताब की शुरुआत कवि आनंद कुमार ने आओ खेलें, अक्कड़ बक्कड़, बॉम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ… के साथ की है. एक के बाद एक बाल कविताएं, कुल मिलाकर एक सौ एक कविताएं. दरअसल, बच्चे खेल-खेल में जितना सीख लेते हैं, उतना वे डांट-फटकार से नहीं सीख पाते. बक़ौल कवि उन्होंने पूरी कोशिश की है कि इन कविताओं को पढ़ने का आनंद क्षणिक न होकर जीवन यात्रा में उनकी समझदारी को स्थायी तौर पर बढ़ाता, मांजता चले, उन्हें दुनिया को देखने समझने की एक सहज, मानवीय एवं तर्कपूर्ण दृष्टि प्रदान करे. इन कविताओं के संसार में आपको सब कुछ मिलेगा. कवि ने कीट-पतंगों से लेकर चांद-सितारे, गांव-शहर, झील-पहाड़, नदी-जंगल और इतिहास-विज्ञान आदि विषयों पर सहज भाषा में लिखा है. कभी शिशु की तरफ़ से, कभी भाई-बहन की तरफ़ से तो कभी मम्मी-पापा बनकर कवि ने सभी के अंदर झांकने की कोशिश में अनेक कविताओं की रचना की है. कवि के मुताबिक़, उन्होंने मूलत: पांच से 15 वर्ष आयु वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए कविताएं लिखी हैं. किताब के पहले खंड में फूल और तितलियों की बातें हैं, तो दूसरे खंड में चिड़ियाघर और डाकिया को जगह दी गई है. तीसरे खंड में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, भगत सिंह और जयप्रकाश नारायण आदि महापुरुषों के बारे में जानकारी दी गई है. कवि ने महापुरुषों से लेकर आज के आइडियल यानी सचिन तेंदुलकर और अमिताभ तक अपनी कविताओं का पात्र बनाया है. खास बात यह भी है कि उपयोगी जानकारी और संदेशों से भरी इन कविताओं को प़ढकर कहीं से ऐसा नहीं लगता कि इनमें कोरे उपदेश दिए गए हैं.

अंग्रेज़ी के महान कवि विलियम वड्‌र्सवथ का यह कहना कि सत्य है कि बच्चा व्यक्ति का पिता होता है यानी हर व्यक्ति में, अस्सी साल के बुज़ुर्ग में भी कहीं न कहीं बालपन अपनी सहज मुस्कान और कौतुकता के साथ जीवित रहता है. इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि इन कविताओं का आनंद हर उम्र में उठाया जा सकता है.

कवि पूर्व नौकरशाह हैं. बच्चों के लिए ज्ञानवर्द्धक कविताएं लिखने के लिए वह बधाई के पात्र तो हैं ही, उनके साथ कल्पज़ प्रकाशन भी बधाई का पात्र है, जिसने आकर्षक साज-सज्जा के साथ इन कविताओं को पुस्तक के रूप में पाठकों तक पहुंचाया है. बच्चों के लिए यह एक बेहतर किताब है, लेकिन इसकी क़ीमत कुछ ज़्यादा है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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तुमको जब भी क़रीब पाती हूं...


मुहब्बत का रिश्ता जिस्म से नहीं होता...बल्कि यह तो वो जज़्बा है जो रूह की गहराइयों में उतर जाता है...इसलिए जिस्म का होना या न होना लाज़िमी नहीं है...बहुत ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिनकी ज़िन्दगी के दामन में यादों के चंद फूल तो होते हैं...वरना इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं...जो जिस शख़्स से मुहब्बत करते हैं और किसी वजह से अपने जज़्बात का इज़हार भी नहीं कर पाए...या अपने महबूब से कभी मुलाक़ात भी नहीं कर पाए...इसके बावजूद उससे इस दर्जा मुहब्बत करते हैं कि उसकी याद में ख़ुद को भी भूल बैठे हैं...

तुमको जब भी क़रीब पाती हूं
दर्दो-ग़म सारे भूल जाती हूं
निज़्द जाकर तेरे ख़्यालों के
मैं ख़ुदा को भी भूल जाती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ
निज़्द : नज़दीक

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फूल, किताबें और एक तस्वीर...



हमारे कमरे में क़दम रखते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है...फ़र्श पर बिछी चांदनी पर...गहरे हरे रंग की ज़मीन पर हल्के बादामी रंग के बड़े-बड़े फूल बहुत ही ख़ूबसूरत लगते हैं...
कमरे में सफ़ेद और सुर्ख़ रंग के फूलों की बहार है...मुझे सफ़ेद फूल पसंद हैं तो उन्हें सुर्ख़ फूल...इसलिए कमरे में दोनों ही तरह के फूल अपनी मौजूदगी का ख़ुशनुमा अहसास कराते हैं...
इसके बाद बारी आती है किताबों की...हमारे पास बहुत सी किताबें हैं...घर पर तो अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी है...सबसे ज़्यादा उर्दू की किताबें हैं...दूसरे तीसरे और चौथे दर्जे पर बारी आती है पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेजी की किताबों की...हिन्दी में रूसी साहित्य की किताबों का अच्छा ख़ासा ज़ख़ीरा है... अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वनी की... यहां यानी दिल्ली में भी हमारे पास किताबों का ज़ख़ीरा है...हम अकसर किताबें ख़रीदते रहते हैं...इसके अलावा समीक्षा के लिए प्रकाशक भी ढेरों किताबें भेजते रहते हैं...

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे तो कभी फटी पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास मुल्क के नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए  एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमें पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. खैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते तो बुरा लगता. छोटे भाई असलम ने हमारी  सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे...  उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता...  फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि  तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...

हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...

जाने कब तक तेरी तस्वीर निगाहों में रही
हो गई रात तेरे अक्स को तकते तकते
मैंने फिर तेरे तसव्वुर के किसी लम्हे में
तेरी तस्वीर पे लब रख दिये अहिस्ता से...  परवीन शाकिर  
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हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के...


तेरी ख़ामोश निगाहों में अया होता है
मुझको मालूम है उल्फ़त का नशा होता है

मुझसे मिलता है वो जब भी मेरे हमदम की तरह
उसकी पलकों पे कोई ख़्वाब सजा होता है

चैन कब पाया है मैंने ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा तो नाराज़ ख़ुदा होता है

हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है
-फ़िरदौस ख़ान

छाया : तस्वीर हमारी ही है...
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चांद तन्हा है, आसमां तन्हा...


फ़िरदौस ख़ान
बहुत कम लोग जानते हैं कि सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री एवं ट्रेजडी क्वीन के नाम से विख्यात मीना कुमारी शायरा भी थीं. मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था. एक अगस्त, 1932 को मुंबई में जन्मी मीना कुमारी के पिता अली बक़्श पारसी रंगमंच के जाने-माने कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में संगीत भी दिया था. उनकी मां इक़बाल बानो मशहूर नृत्यांगना थीं. उनका असली नाम प्रभावती देवी था. उनका संबंध टैगोर परिवार से था यानी मीना कुमारी की नानी रवींद्र नाथ टैगोर की भतीजी थीं, लेकिन अली बक़्श से विवाह के लिए प्रभावती ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था. मीना कुमारी ने छह साल की उम्र में एक फ़िल्म में बतौर बाल कलाकार काम किया था. 1952 में प्रदर्शित विजय भट्ट की लोकप्रिय फ़िल्म बैजू बावरा से वह मीना कुमारी के रूप में जानी गईं. 1953 तक मीना कुमारी की तीन हिट फ़िल्में आ चुकी थीं, जिनमें दायरा, दो बीघा ज़मीन एवं परिणीता शामिल थीं. परिणीता से मीना कुमारी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ. इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को ख़ासा प्रभावित किया था. इसके बाद उन्हें ऐसी फ़िल्में मिलने लगीं, जिनसे वह ट्रेजडी क्वीन के रूप में मशहूर हो गईं. उनकी ज़िंदगी परेशानियों के दौर से ग़ुजर रही थी. उन्हें मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही के रूप में एक हमदर्द इंसान मिला. उन्होंने कमाल से प्रभावित होकर उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उनकी शादी कामयाब नहीं रही और दस साल के वैवाहिक जीवन के बाद 1964 में वह कमाल अमरोही से अलग हो गईं. कहा यह भी गया कि औलाद न होने की वजह से उनके रिश्ते में दरार पड़ने लगी थी.
1966 में बनी फ़िल्म फूल और पत्थर के नायक धर्मेंद्र से मीना कुमारी की नज़दीकियां बढ़ने लगी थीं. मीना कुमारी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री थीं, जबकि धर्मेंद्र का करियर ठीक से नहीं चल रहा था. लिहाज़ा धर्मेंद्र ने मीना कुमारी का सहारा लेकर ख़ुद को आगे बढ़ाया. उनके क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर पड़ा. अमरोहा में एक मुशायरे के दौरान किसी युवक ने मीना कुमारी पर कटाक्ष करते हुए एक ऐसा शेअर पढ़ा, जिस पर मुशायरे की सदारत कर रहे कमाल अमरोही भड़क गए.

कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें पाकीज़ा भी शामिल है. पाकीज़ा के निर्माण में सत्रह साल लगे थे, जिसकी वजह मीना कुमारी से उनका अलगाव था. यह कला के प्रति मीना कुमारी का समर्पण ही था कि उन्होंने बीमारी की हालत में भी इस फ़िल्म को पूरा किया. पाकीज़ा में पहले धर्मेंद्र को लिया गया था, लेकिन कमाल अमरोही ने धर्मेंद्र को फ़िल्म से बाहर कर उनकी जगह राजकुमार को ले लिया. 1956 में शुरू हुई पाकीज़ा 4 फ़रवरी, 1972 को रिलीज़ हुई और उसी साल 31 मार्च को मीना कुमारी चल बसीं. फ़िल्म हिट रही, कमाल अमरोही अमर हो गए, लेकिन मीना कुमारी ग़ुरबत में मरीं. अस्पताल का बिल उनके प्रशंसक एक डॉक्टर ने चुकाया. मीना कुमारी ज़िंदगी भर सुर्ख़ियों और विवादों में रहीं. कभी शराब पीने की आदत को लेकर, तो कभी धर्मेंद्र के साथ संबंधों को लेकर. मीना कुमारी ने अपने अकेलेपन में शराब और शायरी को अपना साथी बना लिया था. वह नज़्में लिखती थीं, जो उनकी मौत के बाद नाज़ नाम से प्रकाशित हुईं :-
मेरे महबूब
जब दोपहर को
समुंदर की लहरें
मेरे दिल की धड़कनों से हमआहंग होकर उठती हैं तो
आफ़ताब की हयात आफ़री शुआओं से मुझे
तेरी जुदाई को बर्दाश्त करने की क़ुव्वत मिलती है…

धर्मेंद्र ने भी करियर की बुलंदियों पर पहुंचने के बाद मीना को अकेला छोड़ दिया. कभी मुड़कर भी उनकी तरफ़ नहीं देखा. मीना उम्र भर मुहब्बत पाने के लिए तरसती रह गईं :-
मुहब्बत
बहार की फूलों की तरह मुझे
अपने जिस्म के रोएं-रोएं से
फूटती मालूम हो रही है
मुझे अपने आप पर एक
ऐसे बजरे का गुमान हो रहा है, जिसके
रेशमी बादबान
तने हुए हों और जिसे
पुरअसरार हवाओं के झोंके
आहिस्ता-आहिस्ता दूर-दूर
पुरसुकून झीलों
रौशन पहाड़ों और
फूलों से ढके हुए गुमनाम जज़ीरों
की तऱफ लिए जा रहे हों,
वह और मैं
जब ख़ामोश हो जाते हैं तो हमें
अपने अनकहे, अनसुने अल्फ़ाज़ में
जुगनुओं की मानिंद रह-रहकर चमकते दिखाई देते हैं,
हमारी गुफ़्तगू की ज़ुबान
वही है जो
दरख्तों, फूलों, सितारों और आबशारों की है,
ये घने जंगल
और तारीक रात की गुफ़्तगू है जो दिन निकलने पर
अपने पीछे
रौशनी और शबनम के आंसू छोड़ जाती है, महबूब
आह
मुहब्बत…

ज़िन्दगी में मुहब्बत हो, तो ज़िन्दगी सवाब होती है. और जब न हो, तो उसकी तलाश होती है... और इसी तलाश में इंसान उम्रभर भटकता रहता है. अपनी एक ग़ज़ल में मीना कुमारी उम्र भर मुहब्बत को तरसती हुई औरत की तड़प बयां करते हुए कहती हैं-
ज़र्रे-ज़र्रे पे जड़े होंगे कुंवारे सजदे
एक-एक बुत को ख़ुदा उसने बनाया होगा
प्यास जलते हुए कांटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा...

कमाल अमरोही से निकाह करके भी उनका अकेलापन दूर नहीं हुआ और वह शराब में डूब गईं. एक बार जब दादा मुनि अशोक कुमार उनके लिए दवा लेकर पहुंचे तो उन्होंने कहा, दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं. इसलिए कुछ तंबाक़ू खा लेने दो, शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो. मीना कुमारी का यह जवाब सुनकर दादा मुनि कांप उठे. मीना कुमारी की उदासी उनकी नज़्मों में भी उतर आई थी :-
दिन गुज़रता नहीं
रात काटे से भी नहीं कटती
रात और दिन के इस तसलसुल में
उम्र बांटे से भी नहीं बंटती
अकेलेपन के अंधेरे में दूर-दूर तलक
यह एक ख़ौफ़ जी पे धुआं बनके छाया है
फिसल के आंख से यह क्षण पिघल न जाए कहीं
पलक-पलक ने जिसे राह से उठाया है
शाम का उदास सन्नाटा
धुंधलका देख बढ़ जाता है
नहीं मालूम यह धुआं क्यों है
दिल तो ख़ुश है कि जलता जाता है
तेरी आवाज़ में तारे से क्यों चमकने लगे
किसकी आंखों की तरन्नुम को चुरा लाई है
किसकी आग़ोश की ठंडक पे है डाका डाला
किसकी बांहों से तू शबनम उठा लाई है…

बचपन से जवानी तक या यूं कहें कि ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक उन्होंने दुश्वारियों का सामना किया:-
आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता,
जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता,
हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता,
बहते हुए आंसू ने आंख से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता,
दिन डूबे या डूबे बारात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता…

मीना कुमारी की ज़िंदगी एक सच्चे प्रेमी की तलाश में ही गुज़र गई. अकेलेपन का दर्द उनकी रचनाओं में समाया हुआ है :-
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां-कहां तन्हा,
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुंआ तन्हा,
ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा,
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहे कहां तन्हा,
जलती-बुझती सी रोशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा,
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा… (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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