ज़िन्दगी में रंग भरें...


फ़िरदौस ख़ान
ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें अपनी ज़िन्दगी बेहद नीरस और बेमक़सद नज़र आती है...यक़ीन मानिए, ज़िन्दगी कभी भी बोझल नहीं होती...यह तो हमारा नज़रिया है जो को ख़ूबसूरत या बदसूरत बनता है...पिछले दिनों डायमंड बुक्स की किताब 'आपके भीतर छिपी सफलता पाने की आठ शक्तियां' पढ़ी...इसके लेखक शिशिर श्रीवास्तव हैं. इस किताब में बताया गया कि किस तरह ज़िंदगी से मायूस व्यक्ति अपने जीवन में इंद्रधनुषी रंग भर सकता है. लेखक का कहना है कि उज्ज्वल एवं सफल भविष्य की राह आपके अपने हाथों में है. ईश्वर भी आपको मार्गदर्शन देंगे और राह दिखाएंगे, पर आधा रास्ता तय होने के बाद. किसी ने कहा है कि कोई भी लौटकर नए सिरे से आरंभ नहीं कर सकता, किंतु कोई भी अबसे आरंभ करते हुए एक नया अंत रच सकता है. बक़ौल हज़रत इनायत खान, आत्मा को उज्ज्वल कर देने वाले शब्द रत्नों से भी अधिक मूल्यवान होते हैं. किताब का एक अध्याय है प्रेम की शक्ति. प्रेम एक कर देने वाली वह शक्ति है, जो ब्रह्मांड में हमें हमारा सच्चा उद्देश्य पाने में सहायक होती है. यह भाव उष्मा, आदान-प्रदान, आनंद, करुणा, आभार, निकटता, सेवाभाव और क्षमा से संबंध रखता है. अल्बर्ट आइंस्टाइन के मुताबिक़, एक मनुष्य उसी संपूर्ण का अंश है, जिसे हम ब्रह्मांड कहते हैं. वह अंश जो समय और काल से सीमित है. वह स्वयं का, अपने विचारों का और भावनाओं का सबसे अलग अनुभव करता है. चेतना का दृष्टिभ्रम एक क़ैद है, जो हमें हमारी निजी इच्छाओं और निकटतम जन के स्नेह तक ही बांध देता है. हमें सभी जीवों और प्रकृति के प्रति करुणा का भाव विस्तृत करते हुए इस दायरे को बढ़ाना चाहिए.

प्रेम शब्द का प्रयोग प्राय: दो प्रेमियों के बीच सशक्त स्नेह भाव को प्रकट करने के लिए किया जाता है. वहीं दूसरी ओर शर्त या समझौता रहित प्रेम परिवार के सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य वचनबद्ध संबंधों के लिए होता है. जब आप किसी व्यक्ति से उसके कार्यों या मान्यता से परे जाकर प्रेम करते हैं तो वह अन्कंडीशनल लव कहलाता है. सच्चा प्यार सबके लिए होता है, जैसे सूर्य की किरणें, जो उष्मा देती हैं. गुलाब की पंखुड़ियां जीवन में रंग और आनंद लाती हैं, पर्वत का झरना मुक्त रूप से प्रवाहित होता है और सभी जीवों के लिए समान रूप से उपलब्ध होता है. लोग इसी प्रेम के अभाव में क्रोध, उलझन और व्यग्रता के शिकार होते हैं. जिस तरह शरीर को भोजन और पानी चाहिए, उसी तरह हमारे मन को भावनात्मक रूप से स्नेह चाहिए. जहां भी इसका अभाव होता है, लोग असामान्य रूप से व्यवहार करते हैं तथा दूसरों के ध्यानाकर्षण के लिए हिंसक और आक्रामक साधनों का सहारा लेते हैं.

प्रेम वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के किया जाए. यहां बदले में कोई अपेक्षा नहीं होती है. जब हम सच्चे हृदय से सबको स्नेह देने लगते हैं तो ब्रह्मांड से हमारा कोई तार जुड़ जाता है और हमारे भीतर से सूर्य की तरह प्रेम की उज्ज्वल और सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है. सूर्य की तरह प्रेम की शक्ति का प्रभाव स्वयं पर भी पड़ता है. हम सच्चा स्नेह देते हैं तो बदले में स्वयं भी वही पाते हैं. जब आप धरती के सभी जीवों को एक समान भाव से स्नेह देते हैं तो सबके साथ जुड़ाव का एक गहरा नाता विकसित होता है. हम परस्पर और प्रत्येक से एक सशक्त संबंध रखते हैं. इस प्रकार प्रेम की शक्ति हमें सदा उपलब्ध रहती है. आप बक़ौल सर विंस्टन चर्चिल, हमें जो मिलता है, उससे अपनी आजीविका चलाते हैं. हम जो देते हैं, उससे एक जीवन बनाते हैं. जब आप स्वयं को क्रोध, ईर्ष्या और वासना आदि नकारात्मक भावों से मुक्त कर देते हैं तो आपके हृदय के भीतर सच्चे प्रेम के अंकुर विकसित होते हैं. जब आप इन भावों को मिटा देते हैं तो आपके भीतर ब्रह्मांड के सकारात्मक प्रवाह को समा लेने का स्थान बन जाता है. यह अच्छे कर्मों और क्षमादान के अभ्यास से ही संभव है. प्रेम की शक्ति अपने साथ सत्यता, सौंदर्य, ऊर्जा, ज्ञान, स्वतंत्रता, अच्छाई और प्रसन्नता का वरदान लाती है. जब चारों ओर प्रेम होता है तो नकारात्मक प्रभाव भी क्षीण हो जाते हैं. प्रेम की सकारात्मक तरंगें नकारात्मकता को मिटा देती हैं. जब आप तुलना छोड़कर स्वयं को सृजन चक्र से जोड़ देते हैं तो आपके हृदय में बसी प्रेम की शक्ति में निखार आता है. मदर टेरेसा ने कहा था, हम इसी उद्देश्य के लिए जन्मे हैं, प्रेम करने और पाने के लिए.

प्रेम रचनात्मक विचारों के प्रति केंद्रित होने में सहायक होता है, हमें अपने लक्ष्यों पर भरोसा बनाए रखने में सहायक होता है, हमारी कल्पना एवं आंतरिक शक्ति में वृद्धि करता है. यह एक रचनात्मक और निरंतर बनी रहने वाली ऊर्जा है और आकाश के तारों की तरह अनंत है. प्रेम में चुंबकीय और चमत्कारी शक्तियां हैं और ये पदार्थ और ऊर्जा से परे हैं. एक बेहद रोचक कहानी है. एक निर्धन लड़का अपनी शिक्षा का खर्च चलाने के लिए घर-घर जाकर वस्त्र बेचता था. एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी जेब में केवल दस सेंट बचे हैं. वह भूखा था, उसने तय किया कि वह अगले घर से थोड़ा भोजन मांगेगा. जब उसने एक ़खूबसूरत युवती को घर का दरवाज़ा खोलते देखा तो उसकी भूख मर गई. वह भोजन की बजाय एक गिलास पानी मांग बैठा. युवती ने उसे पानी की बजाय दूध ला दिया. लड़के ने दूध पीने के बाद पूछा, इसके लिए कितना देना होगा? जवाब मिला, तुम्हें कुछ नहीं देना होगा, मेरी मां ने सिखाया है कि किसी की भलाई करने के बाद उससे अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. लड़का बोला, मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूं. कई वर्षों बाद वह महिला बीमार हो गई. स्थानीय डॉक्टरों ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में भेज दिया, ताकि वहां के विशेषज्ञ उसकी खोई सेहत लौटा सकें. वहां डॉ. हावर्ड कैली कंसल्टेट थे. जब उन्होंने महिला के शहर का नाम सुना तो स्वयं वहां पहुंच गए. उन्होंने झट से उस दयालु महिला को पहचान लिया और उसकी प्राण रक्षा का संकल्प लिया. वह पहले दिन से ही उस मामले पर विशेष ध्यान देने लगे और वह महिला स्वस्थ हो गई. उन्होंने निर्देश दे रखे थे कि महिला का बिल उन्हें ही दिया जाए. उन्होंने बिल देखा और उसके कोने पर कुछ लिखकर महिला के कमरे में भेज दिया. महिला को लगा कि उसे आजीवन वह भारी बिल अदा करना होगा, पर बिल के कोने में लिखा था, एक गिलास दूध के बदले में दिया गया: डॉ. हावर्ड कैली.

दरअसल, प्रेम आपके भीतर विनय भाव पैदा करता है. क्षमा करना आत्मा का सौंदर्य है, जिसे प्राय: नकार दिया जाता है. हो सकता है कि कई बार दूसरे आपके कष्ट का कारण बनें. आप स्वयं को आहत और क्रोधित पाएंगे. ऐसे में आपको इसे भूलना सीखना होगा. किसी को क्षमा करते ही आपके मन को भी चैन आ जाएगा. आप भी अतीत के घावों से मुक्त होंगे और समय सारे कष्ट सोख लेगा. यहां आपका मा़फ करने और भुला देने का निर्णय अधिक महत्व रखता है. बक़ौल मैक्स लुकाडो, क्षमा देने का अर्थ है, किसी को मुक्त करने के लिए द्वार खोलना और स्वयं को एक मनुष्य के रूप में एहसास दिलाना.जब आप स्वयं तथा दूसरों से सच्चा प्रेम करते हैं तो पाएंगे कि पूरा संसार आपसे प्रेम करने लगा है. लोग धीरे-धीरे आपको चाहने लगेंगे. यदि लोग परस्पर ईमानदारी और प्रेम से बात करें तो सभी संघर्षों का समाधान हो सकता है. जब आप प्रत्येक समस्या का सामना प्रेम से करेंगे तो आपका कोई शत्रु नहीं होगा. लोग आपको एक नई नज़र से देखेंगे, क्योंकि उनके विचार अलग होंगे और वे आपके बारे में पहले से एक प्रभाव बना चुके होंगे. बक़ौल गोथे फॉस्ट, एक मनुष्य संसार में वही देखता है, जो उसके हृदय में होता है. एक सदी पहले तक लोग बिना किसी पासपोर्ट या वीजा, बिना किसी पाबंदी के पूरी दुनिया में कहीं भी जा सकते थे. राष्ट्रीय सीमाओं का पता तक नहीं था. दो विश्व युद्धों के बाद कई राष्ट्र स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, पहचान का संकट उभरा और कई संकीर्ण राष्ट्रवादी भावनाएं सामने आ गईं. ये भावनाएं इतनी मज़बूत थीं कि बच्चों को अपने ही देश की सभ्यता और परंपरा पर गर्व करना सिखाया जाने लगा और देशभक्ति का विचार पनपा. इसने पूरी दुनिया के धनी और निर्धनों की खाई को गहरा कर दिया. बक़ौल मोकीची ओकादा, यदि आप संसार से प्रेम करेंगे और लोगों की सहायता करेंगे तो आप जहां भी जाएंगे, ईश्वर आपकी सहायता करेंगे. किताब बताती है कि इंसान के अंदर ही वह शक्ति छिपी हुई है, जिसे पहचान कर वह अपने जीवन में बेहतरीन बदलाव ला सकता है. याद रखें कि ज़िन्दगी बार-बार नहीं मिलती...


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अपने देश में बेगानी हिन्दी...




हर भाषा की अपनी अहमियत होती है...फिर भी मातृ भाषा हमें सबसे प्यारी होती है...क्योंकि उसी ज़बान में हम बोलना सीखते हैं...बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है...इसलिए भी मां बोली हमें सबसे अज़ीज़ होती है... लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िन्दगी बसर करते हैं, यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को 'तुच्छ' समझते हैं...बार-बार अपनी मातृ भाषा का अपमान करते हुए अंग्रेजी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हैं...हिन्दी के साथ ऐसा सबसे ज़्यादा हो रहा है...वो लोग जिनके पुरखे अंग्रेजी का 'ए' नहीं जानते थे, वो लोग भी हिन्दी को गरियाते हुए मिल जाएंगे...हक़ीक़त में ऐसे लोगों को न तो ठीक से हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी...दरअसल, वो तो हिन्दी को गरिया कर अपनी 'कुंठा' का 'सार्वजनिक प्रदर्शन' करते रहते हैं...
अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है...इंसान को अंग्रेजी ही नहीं, दूसरी देसी-विदेशी भाषाएं भी सीखनी चाहिए...इल्म हासिल करना तो अच्छी बात है,
लेकिन अपनी मातृ भाषा की कुर्बानी देकर किसी दूसरी भाषा को अपनाना हमें तो क़तई मंजूर नहीं...और आपको...?


अपने देश में बेगानी हिन्दी... 
-फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को छह दशक से भी ज़्यादा का वक़्त बीत चुका है। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

गौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्टीय्र स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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नील का हम पर हक़ है...


फ़िरदौस ख़ान
नील दुनिया की सबसे लंबी नदी है. क़ुरआन और बाइबल में भी इस नदी का ज़िक्र आता है. नबी और यहूदी धर्म के संस्थापक  हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी मां ने नील नदी के हवाले कर दिया था.  मिस्र के फ़िरऔन के ज़माने में जन्मे मूसा यहूदी माता-पिता के की औलाद थे, लेकिन मौत के डर से उनकी मां ने उन्हें नील नदी में बहा दिया था. उन्हें फ़िरऔन की पत्नी ने पाला और मूसा एक मिस्री शहज़ादे  बने. बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वो यहूदी हैं और उनके यहूदी मुल्क  को फ़िरऔन ने ग़ुलाम बना लिया है. हज़रत मूसा ने एक मिस्री व्यक्ति से एक यहूदी को पिटते देखा तो उन्हें ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उस मिस्री को मार डाला और मदैन चले गए.  वहां उन्होंने विवाह कर लिया और अपने ससुर के घर 10 साल तक रहकर उनकी ख़िदमत की. इसके बाद वह अपने परिवार सहित वहां से रवाना हो गए. एक पहाड़ पर उन्होंने आग जलती देखी. वह अकेले पहाड़ पर गए.  यहां  हज़रत  मूसा की अल्लाह से मुलाक़ात हुई. अल्लाह के आदेश पर उन्होंने फ़िरऔन को हराकर यहूदियों को आज़ाद कराया और उन्हें मिस्र से इस्राईल पहुंचाया.

जब हज़रत मूसा अपने लोगों को आज़ाद कराकर मिस्र से रवाना हुए तो फ़िरऔन की फ़ौजों ने उनका पीछा किया. फ़ौज को आते देख हज़रत मूसा ने नील से रास्ता मांगा. और फिर नील नदी में रास्ता बन गया. सभी लोग नील को पार कर दूरी तरफ़ पहुंच गए, लेकिन जब फ़िरऔन की फौजें इस रस्ते पर आईं तो नील ने सबको गर्क कर दिया. मगर नील ने फ़िरऔन को वापस फ़ेंक दिया. रास्ते में इस्राईल संतति को अल्लाह की तरफ़ से दिव्य भोजन- 'मन्न', 'सल्वा' आता था. जब वह अल्लाह से बात करने और उसके आदेश लेने के लिए गए थे और अपने भाई हारून के ज़िम्मे इस्राईल संतति को कर गए थे. इस दौरान कुछ लोगों ने 'सामरी' के बहकावे में आकर एक बछड़ा बनाकर उसकी पूजा शुरू कर दी. सामरी ने जिब्राइल की धूलि से बछड़े में बोलने की शक्ति तक पैदा कर दी थी. जब हज़रत मूसा ने अल्लाह से बात की तो जवाब मिला - तू न देख सकेगा. अच्छा पहाड़ की तरफ़  देख. उस तेज़ को देख वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े. अल्लाह ने अपने आदेश को पट्टियों पर लिखकर उन्हें दिए. हज़रत मूसा ने इस्राईल को अल्लाह द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए,  जो आज भी यहूदी धर्म का प्रमुख स्तंभ है. क़ाबिले-गौर है कि फ़िरऔन की लाश को एक बक्से में रखा गया है.

गौरतलब  है कि  नील नदी अफ्रीका की सबसे बड़ी झील विक्टोरिया से निकलकर सहारा मरुस्थल के पूर्वी हिस्से को पार करती हुई उत्तर में भूमध्यसागर में गिरती है. यह भूमध्य रेखा के निकट भारी वर्षा वाले क्षेत्रों से निकलकर दक्षिण से उत्तर क्रमशःयुगाण्डा, इथियोपिया, सूडान एवं मिस्र से होकर बहते हुए एक लंबी घाटी बनाती है, जिसके दोनों तरफ़ की ज़मीन पतली पट्टी के रूप में हरी-भरी   नज़र आती है. यह पट्टी दुनिया का सबसे बड़ा मरूद्यान है. इसकी कई सहायक नदियां हैं, जिनमें श्वेत नील एवं नीली नील मुख्य हैं. अपने मुहाने पर यह 160 किलोमीटर लंबा और 240 किलोमीटर चौड़ा विशाल डेल्टा बनाती है. घाटी का सामान्य ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है. मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास इसी नदी की घाटी में हुआ है. इसी नदी पर मिस्र देश का प्रसिद्ध अस्वान बांध बनाया गया है.

नील नदी की घाटी का दक्षिणी भाग भूमध्य रेखा के समीप स्थित है. यहां भूमध्यरेखीय जलवायु पाई जाती है. यहां साल भर तापमान ज़्यादा रहता है.  सालाना बारिश का औसत 212 सेमी. है. इसी वजह से यहां भूमध्यरेखीय सदाबहार के वन पाए जाते हैं. नील नदी के मध्यवर्ती भाग में सवाना तुल्य जलवायु पाई जाती है. इस प्रदेश में सवाना नामक उष्ण कटिबन्धीय घास का मैदान है. यहां पाए जाने वाले गोंद देने वाले पेड़ों के कारण सूडान दुनिया का सबसे बड़ा गोंद उत्पादक देश है. उत्तरी भाग में वर्षा के अभाव में खजूर, कंटीली झाड़ियां और  बबूल आदि मरुस्थलीय वृक्ष मिलते हैं. उत्तर के डेल्टा क्षेत्र में भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है. यहां वर्षा सर्दियों के मौसम में होती है...

नील नदी के बारे में लिखी मिस्र के प्रोफ़ेसर अहमद अल क़ादी की यह नज़्म याद आती है...
मिस्र की तरफ़ लौट आओ 
नील का पानी हम सबके लिए काफ़ी है...

उसने तुम्हें ज़िन्दगी के
वो अच्छे दिन अता किए
जिन्हें तुम याद करते रहते हो...
फिर तेल ने डॉलर को लेकर 
हमने बहकना चाहा...

मिस्र की तरफ़ लौट आओ 
उसके किनारों की गहराइयों में जाओ
नील का हम पर हक़ है...

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