हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...



आज जब मेल देखा तो...एस साहब की एक तहरीर मिली...एस साहब पिछले काफ़ी अरसे से हमारी तहरीरें पढ़ते हैं... मेल भी करते रहते हैं...कई बार जवाब न पाकर नाराज़ भी होते हैं...फिर मुआफ़ी मांगने पर मुआफ़ भी कर देते हैं... कभी-कभार फ़ोन पर भी बात हो जाती है...एस साहब एक नेक दिल इंसान हैं...उनसे बात करके हमेशा अच्छा लगता है...बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जिनसे बात करके मुसर्रत हासिल होती है...वरना आज की मशीनी ज़िन्दगी में कहां वक़्त होता है किसी से गुफ्तगू करने का...ज़रूरत पड़ने पर ही किसी को फ़ोन किया जाता है...या फिर कुछ रिश्ते निभाने के लिए मजबूरन फ़ोन करना पड़ता है...
बहरहाल, बात नज़्म की पिछले दो दिन से एस साहब से बात नहीं हो पाई...लेकिन इसका फ़ायदा ही हुआ...हमें एक बेहतरीन नज़्म पढ़ने को मिल गई...पेश है एस साहब की नज़्म-

हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...

तुम्हारे न होने वाला मेरा ये दिन
इर्दगिर्द मेरे हो निर्जन समंदर...
पास से दूर दूर तक फैला... दूर आसमां छूता.
आसपास की हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...
दिन भर था
और दिन अघटित-सा गुज़रता भी रहा...
मुझे मालूम है जीना है मुझे, यूं  ही...
पर तुम्हारा कुछ पल मुझसे  बात कर लेना,
या एक मेल  ही भेजना...
जीने के लिए  नाकाफ़ी तो नहीं
दूरियों का अहसास है, भौगोलिक भी  बद्ध भी...
फिर क्यों कुछ मांग सकूं तुमसे,  मेरे वश में जो  नहीं.
सब कुछ असंभव सा ही तो है
और आशंका  तुम्हारे भीतर तो कहीं  भी नहीं...
पर क्या  अगर  कोई पसंद आ  जाए किसी को
उसकी नियती उसे पा लेना ही  तो नहीं...
पर फिर भी तुम्हारी कुछ लम्हों की  रिश्ता निभाई
मुझ में दिन भर की  खुशी छोड़  जाए...
जो खुशी मुझे  टूंकी या लंबे अंतराल सी भी  लगे...
खुशी जिसे मैं खींचता चलूं दिन की शाम तक या देर रात तक.
या फिर कुछ और देर तक ...
मैं यह भी जानूं
तुम्हारी ज़िंदगी का किनारा कहीं ओर है.
यह मैं जानूं
पर तुम्हें तो मालूम ही है...आधिकारिक तौर पर
असमंजस में तो मैं रहूं...
पर यही तो होना है
मेरे चाहने  न चाहने से क्या होगा...
एक वक़्त वो भी तो आएगा जब मेरी चाह दरकिनार हो जाएगी,
अनायास सहज ही...
और बचे रहेंगे
छोटे-छोटे अहसासों के हरे-हरे लम्हे
जो तुमने ही कभी-कभार  डाले थे
मेरी झोली में...
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4 Response to "हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार..."

  1. सदा says:
    1 अक्तूबर 2011 11:30 am

    इन आहटों का जिक्र ...बहुत कुछ कहता हुआ

  2. वन्दना says:
    1 अक्तूबर 2011 5:36 pm

    वाह बहुत ही सुन्दर भावो को सहेजा है।
    http://vandana-zindagi.blogspot.com ye bhi dekhiyega

  3. आलोक मोहन says:
    2 अक्तूबर 2011 11:03 am

    बहुत ही बढ़िया
    युवा पहल

  4. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    6 अक्तूबर 2011 10:12 pm

    बहुत हुनर से बात कहती नज़्म...
    संवाद मीडिया के लिए रचनाएं आमंत्रित हैं...
    विवरण जज़्बात पर है
    http://shahidmirza.blogspot.com/

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