ज़िन्दगी अमावस की स्याह रात है

ज़िन्दगी
अमावस की
स्याह रात है
जिसमें
रौशन हैं
उम्मीदों के
हज़ारों दीये...

दुख और तकलीफ़ों का अंधेरा
कितना ही घना
क्यूं न हो...

एक न एक दिन
सुख और खुशियों
के उजाले को
ज़िन्दगी के आंगन में
छा ही जाना होता है
बिल्कुल
पहले पहर की
उजली धूप की तरह...
फ़िरदौस ख़ान
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फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में


जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
वो जुस्तजू, वो मोड़, वो संदल नहीं रहा

आप अगर यूं ही मुझे तकते रहे
नाम अपना आइना रख लूंगी मैं

रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे

देख लेना मेरी तक़दीर भी चमकेगी ज़रूर
मेरी आवाज़ से रौशन ये ज़माना होगा

जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन
हर इक क़तरा मेरी जां कतरा-ए-शबनम नहीं होता

आज अपनी पसंद के चंद अशआर पोस्ट कर रही हूं...उम्मीद करती हूं पढ़ने वालों को पसंद आएंगे...
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इस देस को 'फ़िरदौस' जफ़ाएं नहीं आतीं


ख़ुशहाल घरों में यूं बलाएं नहीं आतीं
भारत में मेरे जंग की हवाएं नहीं आतीं

ग़ुरबत में ग़रीबों का ये क्या हाल हुआ है
लाचार के होंठों पे दुआएं नहीं आतीं

सरकार बनाने से क़बल खाते हैं क़समें
पर सबको पता, इनको वफ़ाएं नहीं आतीं

बादल तो गरजते हैं, मगर ये भी हक़ीक़त
आंगन में ग़रीबों के घटाएं नहीं आतीं

आज़ाद वतन है मेरा आज़ाद फ़िज़ाएं
पर फिर भी सुरीली-सी सदाएं नहीं आतीं

दुनिया को सिखानी है, यही एक रिवायत
इस देस को 'फ़िरदौस' जफ़ाएं नहीं आतीं
-फ़िरदौस ख़ान
शब्दार्थ = गुरबत - ग़रीबी, सदाएं - आवाज़ें
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तुम क्यूं चले जाते हो, मुझसे दूर, बहुत दूर...

ऐ दोस्त !
तुम क्यूं चले जाते हो
मुझसे दूर, बहुत दूर...
अकसर
उस वक़्त
जब मुझे
तुम्हारी बहुत ज़रूरत होती है...
-फ़िरदौस ख़ान
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चैन कब पाया है मैंने ये न पूछो मुझसे

तेरी ख़ामोश निगाहों में अया होता है
मुझको मालूम है उल्फ़त का नशा होता है

मुझसे मिलता है वो जब भी मेरे हमदम की तरह
उसकी पलकों पे कोई ख़्वाब सजा होता है

चैन कब पाया है मैंने ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा तो नाराज़ ख़ुदा होता है

हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है
-फ़िरदौस ख़ान
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मौसम बदलते रहते हैं...


वक़्त-दर-वक़्त
मौसम बदलते रहते हैं
मगर
नहीं बदलता
रोज़ी-रोटी के लिए
काम में जुटे रहने का सिलसिला...
-फ़िरदौस ख़ान
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